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भारतीय ग्रन्थमाला--संख्या ३२

देशी राज्यों की जन-जागति

रियासती जनता लम्बी गहरी नींद से जाग रही है | वह अपने पेरों पर खड़ी हो रही है | कोई अब उसे रोक नहीं सकता |

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रतीय ग्रन्थमाल[-.-संख्या ३२

देशी राज्यों की जन-जाग्रति

लेखक

देशी राज्य शासन, मारतीय शासन कोटिल्य की शासनपद्धति, श्रादि पुस्तकों के

रचयिता

भगवानदास केला

भारतीय ग्रन्थमाला, दारागंज, इलाहाबाद

मूल्य पाँच रुपये

पहला सरकरण

१००० प्रतियाँ सन्‌ १६४८८ [

* देशो राज्य शासन? ( जितका मूल्य साढ़े तान झुपये है ) के साथ लेनेवालों से इस पुस्तक का मूल्य ४)

प्रकाशक :--- भसगवानदाश्र केला व्यवस्थापक भारतीय ग्रन्थमाला दारागंज (इलाहाबाद)

मुद्र के! --- झ[र० एन० श्रवस्थोी कायस्थ पाठशाला प्रेत एण्ड प्रिंटिंग स्कूल, इलाहाप्राद

निवेदन

अंगरेजों के शासन-काल में मारतवर्ष के राजाश्रों ने अपने निरंकुश अधिकार, अपनी गद्दी और राज-चिह्न बनाए रखने के लिए क्या-कुछ नहीं किया ! सैकड़ों राज्यों में से, दो-एक भ्रपवादों को छोड़ कर, कौनसा ऐसा भाग्यशाली है जहाँ के शालक ने विना संघर्ष जन- जायति हो जाने दी दो, जिसने सा4जनिक कार्यकर्ताओं के लिए समय- समय पर दमन, शोषण, लाठी-चाज, गोलीकांढ, निरवासन श्रौर जेल ग्रादि का भरसक उपयोग किया दो |

श्रव भारतवर्ष में अंगरेजी राज समाप्त द्वो गया है, पर उसका भूत बना दुश्रा है। थोड़े से ही राजाश्रों ने श्रपनी एच से शासन सत्ता लोऊ-प्रतिनिधियों को सौंगने की दूरदशिता दिखाई दे। श्रधिकाश ने तो बड़ी श्रनिच्छा और मजबूरी से ही कुछ शासन-सुघार किए हैं लोकसेवकों के त्याग और तथ तथा सर्वसाघारण के कष्ट-सहन से राजाबओं हो उत्तरदायी शासन स्थापित करने की प्रे रणा मिनी श्रोर मिली रही हे

राजाओं के प्रायः स्वेच्छाचारी शासक से लेकर वैधानिक शासक के पद पर आने तक जन-जागति की विधिध श्रवस्थाएँ रहो हैं | इसको कथा बहुत लम्बी दै। बड़े-बड़े राज्यों में से तो इरेक अपनी अलग- ग्रलग घुस्तक चाहता ही है, क्रितने दी छोटे-छोटे राज्यों का जन- ज(गरण मी काफी रदस्यपूर्ण, मनोर॑जक, शिक्षाप्रद श्रोर कई आंशों में रोमांच भारी है। यह तो निविवाद द्वी है कि सत्र देशी राज्यों को जन-जायति कै यथेष्ट वर्णन के लिए, एक पुस्तक पर्यात्त नहीं होसकती; इसके वास्‍्ते तो एक ग्रन्थमात्रा ही चादिए | ऐसी ग्रन्थमाल्ा के लिए

२९ )

सामग्री जुटाना, उसका सम्पादन करना, और फिर उसे प्रकाशित करना बढ़ी-बड़ी साधन-सम्पन्न त्यागशील और सेवाभावी संस्थाश्रों का काम है। हिन्दी साहित्य का भर्विष्य श्राशाजनक हाने पर भी, कौन - जाने उपराक्त संस्थात्रां के संगठन में ग्रभी कितना समय लगे। इमने श्रपने रांमत साधन के श्रनुतार यद्द काम, जैसा बन श्रावे, कर डालने का निश्चय किया |

यह पुस्तक एक प्रकार से हमारी 'दिशी राज्य शासन? की पूरक है। उतक पहले तसछकरण में हमने जन-जाग!त सम्बन्धी कुछ घटनाश्रों का भी उल्लज किया था, पर दुसरे संस्करण में शान सम्बन्धी विषय को हद रखने के विचार जन ज,गरण का बाते उसमें से हटाला गईं | बात इस पुस्तक मे ।सलशिव॒ुवार श्र विस्तार से ले ली गई हैं साथ हूं। शस पुध्तक देश) राज्यों के शासन सम्बन्धी ऐसे परिवर्तनों के। भी समावश है, जो उस पुस्तक छ+न के बाद हुए हैं

इस पुस्तक के १६ल भाग में एल बात। का वन किया गया है, जो व्यापक हैं, जिनका सम्बन्ध सभं। अ्रथवा कई-कई राज्यों से है दूसरे भाग में इसने नमूने के तोर पर कुछ खास-खास राज्यों या राज्य-समुहों की जन-जा'ति का विचार किया है; ६ाँ, नमुने भारतवर्ष के उत्तर, दक्षिण, पर्व, ५श्चिम और मध्य--सभी भागों के लिये गए हैं। भ्रधिक अ्रधिक राज्यों का विचार कर सकने के उद्देश्य से हमने यथा-लम्भव संक्षेप में लिखा हे। इस प्रकार यह पुस्तक श्रपने विशाल विषय की राँको मात्र हे | तथाप इससे पाठक्नो' को यह मालूम हो जायगा कि जन-जा'ति देश के किस। खाध भाग की रियापतां में ही सीमत नही है, उसकी लद्दर सभी (रयासतों में पहुँच गई हे; भत्ते ही उसका परिणाम या फल स्थल रूप से दिखाई दे किन्तु कार्य- कर्ताओं के लिए श्रभी भी काम की कमी नहीं, यह पुस्तक में स्पष्ट बता दिया गया है |

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हमने इस पुस्तक के लिए, मरसक प्रयत्न किया है| मई-जून १६४७ में श्रस्वस्थ दोते हुए भी इमने देहली, जयपुर, जोधपुर शोर श्रज्मेर की यात्रा की | देइली में श्र० भा० दे० रा० लो कपरिषद्‌ के विविध कार्य- कर्ताश्रों से मिलकर कुछ बार्ते मालूम कीं। लोकसमाचार समिति के संचाजक मित्रवर भ्री० जगदीशप्रसाद जी चतुवेंदी बी० ए०, एश- एल० बी० ने हमारी उस समय तक तैयार की हुई ह्तलिखित प्रति को देख कर श्रावश्यक सुकाव दिए। पीछे श्रापने इस पुस्तक की प्रत्तवषना लिखने की भी कृपा की। भी शोभालाल जी गुप्त ( स० सम्गदक, “हिन्दुस्तान! ) ने इमें राजस्थान-सेबा-सद्ध की दो पुगनी फाइलें दीं, उनसे हम हम पुध्तरु के कई विषयों पर विशेष प्रकाश ढाल सके हैं | जयपुर में देनिक “लोकवाण! के स० सम्पादक श्री पर्णाचन्द जी जैन एम० ए० से तथा दुगम जी जोशी से कई विषयो' पर विचार- विनिमय हुश्रा | यहाँ श्ञान-मन्दिर मे संग्रह को हुईं सामग्रो के उपयोग करने की भी हमें धुर्धि मित्री जोधपुर में सवश्री श्रचलेश्वरप्रसाद शर्म ( सम्पादक “प्रजा सेवक? ), रणछोड़ दास जी गदुटाणी बी० ए०, ए.न-ए, » बी० तथा भंत्रलाल जी सर्गफ से खासकर जोधपुर राज्य सम्बन्धी सामग्री मिलती ध्वजमेर में श्री रामनारायण जी चोघधरी ने हमें झपने पिछले जेल-जीवन में लिखी 'राजस्थान का सार्वजनिक जीवन? पुस्तक की हस्तलिखित प्रस्ते से लाभ उठाने का श्रवसर दिया। भी० रघुधरदयाल जी के श्रादेशा से श्री मूलचन्द जी पारीक ने बीकानेर के बारे में कुछ श्रावश्यक बातें हमारे पास लिख भेजने की कृपा को | इन सब सजनो' के हम बहुत कृतश हैं |

ध्रगस्त १६४७ से भारतवर्ष के इतिहास का नया श्रध्याय लिखा गया है। खासकर दिसम्बर १६४७ श्रोर जनवरी १६४८ देशी राज्यों" के लिए, कैसे परिव के रहे हैं, इसका श्रनुमान इसी बात से हो सकता है कि इस समय में भारतवर्ष के ४४० राज्यो' में से ३८५

( )

समाप्त हो गए या होने वाले हैँ इनमें काठियावाड़, उड़ीसा, छुत्तीस गढ श्र बुन्देलखंड श्रोर दक्षिण के राज्य हैं | टेहरी-गढ़वाल की घट- नाएँ श्राकृस्मिक या नाटकीय प्रतीत होती हैं अ्रत्तु, पुस्तक में नई से नई बातों का समावेश किया गया है

इस पुस्तक को लिखते समय बारबार हमारे मन में उन त्यागशीक्ष महानुभावों का चित्र ग्राया, जिन्होंने लोक-सेवा के लिए तरह-तरह के कृष्ट उठाए और मानत्िक यातनाएं भोगीं; जो श्रपने माता-पिता, स्त्री, बच्चों श्रौर रिश्तेदारों से बछड़े रहे, जिन्होंने निन्‍्दा-स्तुति तथा माना- पमान की परबा की, जो कितनो ही बार श्रपने घनिष्ठ मित्रों श्रौर साथियों की गलतफहमी श्रोर श्राक्षे पों के शिकार हुए, पर जो इन कठोर परीक्षाश्रों $ खमय भी अपने कर्तव्य-पथ से विचलित नहीं हुए धन्य है ऐसे महानुभावों को | उन्होंने अपना जीवन सफल किया, और यदि शासन की निरंकुशता ने उन्हें बेग्राई मोत मार डाल्ग, तो वे मर कर श्रमर हो गए | दम श्रपने जीवन के पिछले पन्दरदह महीने श्रघिक्तर इन लोकसेवकों की स्मृति में लगा सके, इसका इर्मे सन्‍्तोष और आनन्द हे। श्राशा हे हमारी यह बिनप्न रचना मानवता के उपापक़ों श्र खासकर रियासतोी जन-जागरण के प्रेमिय' क' रुचिकर होगी |

बिनीत +उावा+न टटक कोट्य

पैशी राज्य शासन, का दूसरा संस्करण छप गया है। उप्रका परिचय इस पुष्तक के श्रन्त में दिया गया है

प्रस्तावना

देशी राज्यों की समस्या श्राज भारत को प्रमुख राजनीतिक समस्या है। जच्र तक उनकी जनता भोौ प्रान्तों के निवासियों के समकछ् हो जाय, भारतवर्ष को सुरक्षा, शाम्ति श्रौर उन्नति वथेष्ट रूप से नहीं हो सकती | रियासती जनता को दोहरी गुलामी से छुटकारा पाने का जो प्रयत्न करना पढ़ा और पड़ रहा है उसका इतिहास बड़ा गौरवपूर्ण॑ है, यद्यपि वह प्रकाशित नहीं ह्ुुप्रा है उनके संग्राम में वह चमकदार रोशनी तो नहीं थी जो सारे संसार में चकार्चोष कर सके, पर उसमें वह आंतरिक शक्ति श्रवश्य थी जो अंधकार या प्रकाश में समान रूप से टिक सके। रियासती श्रान्दोलन-कर्ताश्रों को प्रतिष्ठा, पद अ्रथवा मान-मर्यादा से दूर द्वी रहना पड़ा है। समाचार को दुनिया में वे एए% ऋने में पड़े रहे हैं। लेकिन उनके त्याग और पुरुषार्थ को देखा जाय तो हमें श्राश्चर्य होगा

अ्राज से चालीस पचाप साल पहले रियासती भारत उसी दुनिया में था, जिसमें उनके दादे परदादे शताब्दियों से रहते आये थे | शिक्षा, उद्योग, ऐसी चीजों की वहाँ ग्रुजायश ही कहाँ थी! रियासतों में क्या होता था, मानवता क्रिस प्रकार पददलित होती है, सामंती शासन मानव जीवन के साथ कैसी विभीषिक्रा रचता है, इसका पता श्राज तरून लगता, यदि चन्द मुद्दी भर नौजवानों ने श्रपने जोबन की श्राहुति देक' शासन से विद्रोह किया द्वोता | उनको इस बात की भी श्राकांज्षा नहीं थी कि कोई उनका नाम याद रखेगा उनके जीवन में उनका नाम शायद ही छुपा हो--बाद में

( 9

कौन किसे याद करता है। श्राज तक किती ने उनका इतिहास लिखने का विचार नहीं किया था और जब विवार भी क्रिया गया तो उनके बारे में सामग्री जुगाना कठिन रहा ; श्राज यदि रियासतों में कहीं-कह्दी नागरिक श्राजादी के दर्शन होते हैं, एकाघ लोकप्रिय मन्त्री दिखाई देते हैं, या सभा सम्मेज्षन हो जाते हें तो उसके पीछे ये नींब के पत्थर हैं।

कोन जानता है कि भारतवर्ष में आज भी ऐसे कोने हैं जहाँ सदियों से कोई सावंजनिक सभा नहीं हुईं, श्रौर जहाँ सन्‌ १६४७ की श्रगस्त के बाद समा हुई तो १७ आ्रादमी गोली के घाट उतार दिये गये श्रौर ५० घायल कर दिये गये। बुन्देलखण्ड के घावनी राज्य के हरचन्दपुर गाँव २५ सितम्बर को नवाबी श्रत्याचार का जो दृश्य दिखाई दिया वह एक युग पहले सारे देश की रियासतों में दिखाई देता था |

देशी राज्यों में जो लोग काम करते थे उनको बढ़ी कठिनाइयों का सामना करना पढ़ा | उनमें से ग्रधि+ंश गरीब श्रादशंवादी युत्रक थे, जिनको राष्ट्रीय कार्य के साथ श्रपना जीवन -निर्वाह भी करना पढ़ता था राज्यों में रह कर काय करना प्रायः श्रसम्मव था, फल-स्वरूप उनकी प्रांतों में श्धर उधर मटठकना पड़ता था। कहीं-कहीं यह ध्थिति अ्रत्॒ भी है | कांग्रे की नीति राजाओं के साथ रूगढ़ा करने की नहीं थी, ह्सलिए उनको श्रपना कार्य श्रपने ही बल पर चलाना पड़ा। य्यि श्राजकल्ल समाचारपन्र रियासती जनता को प्रावाज़्ञ प्रकट करने को उत्सुक रहते हैं, उस समय किसी राजा फे विरुद्ध कुछ लिखना कानून के विरुद्ध ही नहीं, नीति के विरुद्ध भी समा जाता था | बड़े-बड़े श्रत॒चार जो अंग्रेजों के विरुद्ध आग बरसाते ये, राजाश्रों के विरुद्ध एक शब्द लिखना देशद्रोह सममते ये। राज्या से ऐसे पत्रों को इनकी सेवाश्रों का पुरस्कार भी मिलता था ओर श्र भी मिलता

( )

है। आज भी जो पन्न राजतन्त्र के विरुद्ध लम्बे.लग्बे अग्रलेल लिख सकते हैं, राजाओं को व्यक्तितत सही शिकायतें छापना पसन्द नहीं करते | अंग्रे जी पत्र तो कया तर और क्या श्र श्रपवाद-स्वरूप ही राज्य-विरोधी समाचार छापते हैं | बड़े-बड़े पत्रों समाचार-समितियों के सम्वाददाता राज्य के प्रकाशन अफसर या श्रन्य श्रघिकारी धोते हैं और उनके द्वारा प्रजा-पक्ष के समथन होने का प्रश्न ही नहीं उठता

इस प्रकार रियासती श्रान्दोलन को तो कुशल नेत॒त्व ही सुलम था, प्रकाशन की सुविधा ही। ग्राथिक सहायता तो और मी नगण्य थी। काटियावाढ़ श्रथवा राजस्थान की चंद रियासतों को छोड़ सारे भारत के रियासती कार्यकर्ता आज तक भीषण अश्रथांभाव से पीड़ित रहे हैं। रित्वासतों में शिक्षा तथा उद्योगों के अ्रभाव ने उस संपन्‍न मध्यम वर्ग को उत्पन्न ही नहीं किबा, जो भारतीय राष्ट्रवाद को तन मन घन से सहायता देता रहा। फल-स्वरूप रियासती श्रांदोलन एक सर्वहारा श्रान्दोलन रहा | पर इसकी कड़ें बहुत मजबूत रही हैं। इसके पीछे जिन हुतात्मओ ने काम किया, उनका बलिदान व्यर्थ नहीं गया श्रौर आज सौमाग्य से देश के बड़े-बड़े नेता रियासती समस्या प्रों में रुचि रखने लगे हैं। श्राज दिन भी हैदराबा द, जूतागढ़ राजस्थान उड़ीसा, बु देलखंड, हिमालय राज्य, पंजाब के रियासती जन-संगठन नीवनमरण संधषं में लगे हैं पर श्राज उनकी सुनने-देखनेवात्े हैं |

भी भगवानदास केला ने इस श्रान्दोलन के प्रथम इतिहास लेखक होने का जो संबल्प किया, उस्के ल्ए ग्यास्ती जनता हिन्दी संसार दोनों उनके कृतश रहेंगे | आज से वर्ष पहले उनकी प्रेरणा से मैंने इस घुरतक को लिखने का इरादा किया था। पर $पने प्रमाद तथा श्रस्त-अ्यस्त परिस्थितियों के कारण यह सौभाग्य मुझे प्राप्त हो सका | इसका फल भ्रष्छा ही हुआ

( छ८छ )

श्री फेला जी जैते विचार-शील लेख 6 के द्वाथ में पुस्त ऐसी रचना बन गयी है ज! जीवित रहेगी। उनकी शारीरिक दुबंलता तथा यात्रा संबंधी कठिनाइबा! के कारण यह संभव है हि जितनो धामप्री पुत्तर में श्रा सकतो थो नहीों श्रा पायी दो, पर जिस वशिश्रम के साथ उन्हेंने सामग्री संग्रह करने का प्रयत्न किया और प्राप्त सामप्री का उगयोग किया, उससे पुम्तक अत्यन्त उपादेय बन गयी है। श्री भला जो इस। प्रद्दार रियासती जनता का सेवा तथा हिन्दी साहित्य के मंहार को वृद्धि कर हम नवथुत्रहों को श्रागे बढ़ने के जिए प्रोत्ताहित करते रहें, यह इमारी कामना हे |

लोक समाचार तमिति १५ विंड3र पतज्ञव; नया दिल्‍लत्। | जगदोी शाप वाद चतुर्वेरो

विषय-सुची

पहला भाम

ग्र्ष्याय विषय

शशि ही 6 ही #ऋ “७४

२७ रे रे श्र ९३ १४ हैक

विषय प्रवेश

ग्रंगरेजी राज में राजाश्रों का स्वेच्छाचार

जनता का असन्‍्तोष कल क्रान्तिकारी ग्रान्दोलन

जाग्रति का भीगणेश

विजो लिया का सत्याग्रद

राजपूताना मध्यमारत सभा

राजस्थान सेवा-संघ (१) [सल्लनठन और आदश ] राजस्थान सेवा-सच्च ( )| १--बेगू का किसान

आन्दोलन, २--मेवाडढ़ के जाटों का श्रान्दोलन,

३-- सिरोही हत्याकांड, ४--थुन्दी में छियों पर फौजी सिपाहियों का इमला, ४-- बुन्दी में गोलीकांड] केन्द्रीय संस्था की स्थापना के प्रयत्न जप झ० भा० दे० रा० लोकपरिषद (पहला अधिवेशन) सन्‌ १६२७ से १६३६ तक * सन्‌ १६३६ के बाद 38७ कांग्रेस और देशी राज्य

विविध विचार धाराएं

छ४

श्२ (6 ३१ ३६

डड कु]

६५ ष्् ६६ २०७ १२४ १३४

दसशा भाग प्रध्याय क्षय

१६ परस्तावना

१७ कशमीर से

!८. पंजाब के राज्य [ शिमला पहाड़ी राज्य ; दूसरे राज्य--यटियाला, नाभा, मरींद] शत

!६ काठियाबाड़ श्रोर युजरात के राज्य [ भावनगर, राजकोट, बढ़ोदा ]

१० राजपूताने के राज्य [ बीकानेर, श्रलवर, भरतपुर जोधपुर, मेवाड़, जयपुर, जैसलमेर, कोटा, डू' गरपुर]

२१ मध्यमारत के राज्य [ गवालियर, इन्दौर, भोपाल, रीबा, रतलाम, माबुआ। ]

१९ संयुक्तप्रान्त के राज्य [टेहरी-गढ़वाल, रामपुर |

११ हैदराबाद रे है मैसूर ८४ १५ ब्रावणशकोर

१६ छोटे-छोटे राज्य [ उड़ीसा, छत्तीसगढ़, बुन्देलखंड, काठियावाढ़-गुजरात, दक्षिण ओर श्रासाम के राज्य]

२७ जन जागृति और खाहित्य कर

२८ उपसहार

ररिशिष्ट--पंजाब के राज्य, पटियाला, कींद, काठिया बाढ़ और गुजरात के राज्य, बीकानेर, अलबर, भरतपुर, जोधपुर, मालवा, गवालियर, इन्दौर, टेहरी - गढ़वाल, हैदराबाद, बुन्देललण

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१४९ १४६

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श्स्प्य ३३७

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द्शी के जज €७ 65 दशा राज्य कं जना-जाखाति दी पहला भाग गक़्क़़कफुन्यून्छ्न्छ्ग्छ्न्क

पहला भ्रध्याय

विषय प्रवेश

इध् घरती पर जिसपर हम खड़े हें, कई हुकूमतें आई झोर

गई' जनता ही रहो है। वह स॒द्दा से यहाँ -है, ओर सश रहेगी वह शासन के अधिकारियों को तरह बदला नहों है हम इन कष्टों में जीते रहे हैं इन करष्टों का अन्त कर देने का धघाज हमने संकल्प कर लिया है। दम इन्हें सम्राप्त भो कर देंगे। हममें से कोई भी अत्याचारियों का हथियार नहीं बनेगा

--बिजय गोविन्द द्विवेदी

प्राचीन काल में राजा ओर प्रजा का सम्बन्ध-- भारतवर्ष में, पहले श्रधिकाश राजा श्रपने राजधर्म का श्रच्छी तरह पालन करते थे, वे प्रजा को श्रपनी संतान मानते हुए, उसकी सुख- समृद्धि का प्रयत्न करते रहते थे। प्रजा भी राजा को इईश्वर-रूप मान कर उसके प्रति बहुत भक्ति-्माव रखती थी। इस प्रकार राजा प्रजा

[ जन-जाण्ति

दोनों के सहयोग श्रोर प्रेम-भाव से राज्य में सुख शान्ति बनी रदह्दती थी धीरे-धीरे राजाग्रों में वि_्ञासिता बढ़ गई, वे एक-दूसरे से ईर्षा करने लग गए, उनकी श्रापस की फूट साफ दिखाई देने लग गई देश-काल के साथ उन्होंने प्रगति नहीं की | सैनिक संगठन श्रौर साधन यहाँ पुराने ढर के बने रहे | उनमें श्रावश्यक सुधार या परिवर्तन नहीं किया गया

घुस लमान बादशाहों का शासन--ऐसी स्थिति में मुसल- मानों का यहाँ श्राकर अपने श्राक्रमणों में सफल होना श्रोर धीरे-धीरे दिल्ली के सिंहासन पर श्रघिकार पा जाना स्वाभाविक ही था मुसलमानों ने यहाँ ने पर जो शासन-व्यवस्था प्रचलित देखी, कुछ-कुछ उसी को श्रपनाना ठीक समझा | श्रारम्म में बहुत समय तक उनके शासन में हृढ़ता रही; समय-समय पर श्रलग-अ्र॒लग खानदानों के बादशाह गद्दी पर बैठते रहे। इनके श्रार्थिक साधन बहुत कम ये, ओर ये स्थानीय नेताश्रों का भी यथयेष्ट सहयोग प्राप्त नकर सके। मुगलों के समय में, खासकर सम्राद अकबर के शासन-क्ाल में उसकी उदार नीति, व्यापक दृष्टिकोण और स्थानीय शासकों के सहयोग से यहाँ केन्द्रीय सत्ता अधिकाधिक दृढ़ होती गई, श्रधिकरांश राजा दिल्लीश्वर के श्रधीन श्र सहायक हो गए। अकबर की नीति जहाँगीर और शाहजहाँ के समय में भी जारी रही। भारतीय राजसत्ता प्रशर्ष होती गई और जनता की सुख समृद्धि बढ़ती रही औरंगजेब के समय में देश खूब घन-धान्य पूर्ण था | पर उसकी साम्प्रदायिक और श्रविश्वास की नीति ने जगह-जगह संघर्ष और विद्रोह पैदा कर दिया। श्रशान्ति बढ़ती गई | उसके उत्तराधिकारियों की विलासिता और श्रारामतलबी ने केन्द्रीय सत्ता को बहुत ही कमजोर कर दिया। सिक्‍ख, जाठ, राज- पूत श्रौर मराठा आदि शक्तियों का उदय हुश्रा। इनमें मराठे विशेष प्रभावशाली रहे सम्भव था कि धीोौरे-घीरे सारे भारतवर्ष में नहीं

विषय प्रवेश ] इे

तो इध देश के अधिकाँश में भाग उतहा प्रभुज्व स्थायरित हो जाता

अंगरेजी राज की स्थापना --पर इत बीच में यहाँ कई योरपीय जातियों की कम्पनियों ने अ्रगना कारोबार फेन्ना लिया, और यहाँ की फूट और श्रराष्ट्रीयाम से लाभ उठाकर वे राजनीतिक सत्ता भो प्रात करने लगीं। इनमें से श्रन्त में अंगरेजों को ईंष्ट इंडिया कम्पनी को सफलता मिली इसने श्रपने व्यागार को बढ़ाने के साथ-साथ यहाँ अपने राज्य का भी विस्तार कर डाला |

इस विषय की व्योरेवार बातों में जाकर द॒में यहाँ यह कहना है कि जब अ्ंगरेजों ने इस देश में अबने पेर जमाए, उत समय यहाँ कोई प्रबल्न केन्द्रीय सत्ता थी। मुगल बादशाह नाममात्र को “सम्राद! था राजपूत आपसे में लड़ रहे थे, मराठो में भी श्रापसी वैमनस्थ् के कारण यथेष्ट सज्ञठन नहीं था, फिर अंगरेजों ने श्रपनी कूटनीति से इन्हें श्र सिक्‍खों को फूट डालकर कमजोर कर डाला श्रोर श्रन्त में अपने श्धीन कर लिया |

राजा लोग मालिक से मातहत बने--मारततर्ष में श्रंग- रेजी राज्य की स्थापना का कार्य सन्‌ १७५७ से श्रारम्भ हुश्रा, कहा जा .सकता है। पहले तो राजा शासक के पद पर थे, ओर अ्ंगरेज उनसे विविध सुविधाश्रों की याचना करनेवाक्षे प्रजाजन थे | धीरे-घीरे श्रंगरेजों के पेर यहाँ जमने लगे। ईस्ट इंडिया कम्मनी की राजाश्रों से संधियाँ होने लगीं। ये तंधियाँ शुरू में बराषरी या मित्रता के नाते हुईं | इनकी संख्या सिर्फ १२ हैं। बाद में कम्पनी की स्थिति दृढ़ होती गई | सन्‌ १८१८ से जो संधियाँ हुईं, वे राजाश्ों को श्रघोनता सूचक होने लगीं। कुल देशी राज्यों में से सिफ चालीस से ही संबियाँ हुईं बाकी को तो सनदें या इकरा रनामे ही दिए गए। श्रौर, किसी राज्थ से संधि हुई हो या उसके वास्ते सनद या इकरारनामा लिखा गया हो श्रौर उनकी शब्दावली चाहे जो रही हो, धीरे-धीरे सर्वोच्च सत्ता ( ब्रिटिश

है [ जन-जाग्रति

रुरकार ) की शक्ति श्रोर अधिकार ब्ढुता गया रीति-रिवाज से उसका गजश्रो के प्रति द्वोनेबाला ब्यवह्वार बदलता गया | संधियों के अश्रधिका- ध्कि भाग बेकाम हो गए, वििटिश सरकार उनसे ब्धी रहने को बाध्य रही | «ड़े से बड़े राजा में भी, चाहे वह पत्रव्यवह्यार में श्रपने श्रापक्रो “रम्रा: का दोस्त” लिखने का गये करता हो, त्रििश सरकार के नियणयों का कुछ क्रियात्म्क विरेध करने को शक्त रही | स्ियों की श्रपेक्षा अ्श सरकार के निणुयों का बल कद्दीं अधिक हो गया | जो राजा लोग ईस्ट इंडिया कम्पनी के बड़े से बड़े से मारतीय अधिकारी से ऊँचे पद वाले थे, जो किसी समय सप्नाद ( इंगलेंड-नरेश ) के मित्र थे, वे' अब सम्राय द्वारा नियुक्त श्रधिकारियों के श्रधीन हो गए

बढ़ौदा राज्य में भिन्न-भिन्न ऊँचे ओहदों पर वर्षों काम करनेवाले भ्री खारेराव जाधव ने अ्रपनी पुस्तक 'वेक-श्रप प्रिसेज' ( नरेशों जागो ! ) में लिखा है--'ये नरेश १हले स्वाघीन ये, श्रापस में उनका नाता बराबरी का था, और ब्रिटिश व्यापारी कारखानों के गवर्नर उनकी अधीनता में ये। परन्तु वहाँ से धीरे-धीरे सुलइनामों, इकरारनामों आर रूढ़ियों ने उनको इन व्यापारी गवनरों की बराबरी में लाकर खड़ा कर दिया। वे इनके मित्र हो गए,। दो राष्ट्रों में जो समानता का सम्बन्ध द्योता है; वह इन दोनों पक्षों के बीच में हुआ; लेकिन वह भी कहाँ रहा ! धीरे-धीरे शक्ति का पलड़ा उधर बढ़ा और नरेश इन व्यापारी गवनरों के ग्राश्नित हो गए। वह अन्तर्राष्ट्रीय बराबरी की बात हवा दो गईं। राजनीतिक श्रन्तर्राष्ट्रीय समानता के पद से गिर कर वे पराधीन श्रौर परमुखापेद्धी हो गए यह है, संक्षेप में इन नरेशों के इतिहास का सार ।?

सन्धियों का पोलखाना-- हमने ऊपर कहा है कि बारइ

राजाश्रों से मनत्रता या बराबरी की सन्धि हुई थी। ५१२ इस मित्रता या बराबरी का मूल्य श्रॉकने के लिए, हमें उस समय के अधिकारियों के भाक

विधय प्रवेश ] पृ

ध्यान में रखने चाहिएँ। गवर्नरजनरल को कोंपित के बढ़े मेंस्वर ( श्रौर पीछे गत्र्नरभनरल ) रहनेवाले सर जाज बालों ने सन्‌ १८०३ में लिखा था #ि ऐसी कोई रियासत रहने देनो चाहिए, जिस पर ब्रिटिश प्रभुत हो, श्रथत्रा जिए पर पू्त ब्रिटिश नियंत्रण हो वान देस्टिग्स ने सन्‌ १८१४ में लिवा--'अपनो सन्वियों में हम उन्हें ( देशी राजाश्रों को ) स्र॒तन्त्र स्त्रीकीर करते हैं। किर हम एक रेजीडेन्ट मुकरंर करते हैं। वह राज[एत को तरह रहकर तानाशाद की तरह रहता है। वह उनके सभी निजी मामज़ों में भी दखत् देने लगता है--और रेजोडेग्ट जो कुछु मी करता है, सरकार सभी में उसके साथ है।” यही नहीं, वान॑ देस्टिग्स ने फरवरी १८१६ के एके लेख में साफ कद्द दिया कि “असल में हमें राजाओं पर ब्रिटिश सरकार का ही सर्व प्रधान प्रभुत्व स्थागित करना है; भले ही हम इसकी घोषणा करें | नाम में नहीं, लेकिन काम में हमें देशों राजह्पों को अयना पिछलग्गू बना देना है।? क्या इत पर भी सन्धियों में सुचित मित्रता या बरात्ररी की बात में कुछ दम रहता हे !

फिर, मित्रता की सन्धि लगभग छु; सो राज्यों में से सिफ बा रद ही राज्यों से हुई थी, इसके बाद जो २८ पन्षियाँ हुई, वे तो साफ तौर से श्रधीनता खूचक थो, प्लोौर शेत्र राज्यों से तो कोई सन्धरि हुईं द्दी नहीं। सन्धियाँ कई प्रकार की हुई हैं, पर वे चाहे क्रिसी भी प्रकार की हु; हों, ओर चाहे बहुत से राज्यों से भो हुई दों, अंगरेजों की नीति यह रही कि जिस राज्य ने उनह़ी बाइरी मामन्नों में ही नहीं, भीतरी मामलों में भों पूरी श्रवोनता स्त्रीक्वर कर लो, उसे तो उन्होंने बना रहने दिया, ओर जिपने जरा स्वामिप्रान या साहत का परिचय दिया, उसे बिलकुत्त मिटा दिया। अपने स्वार्थ को दृष्टि से अंगरेजों ने जहाँ उचित समझा, एक-एक राज्य को कई-कई हिस्सों में धाँद दिया, श्रथत्रा कितनी ही नई रियासतें कायम कर दीं |

[ जन-जा णति

विशेष वक्तव्य--अंगरेज साम्राज्यवादी थे, उनके सामने श्रपने साम्राज्य का हित मुख्य था, रियासतों की जनता के ह्वित की आड़ में उनका स्वार्थ सिद्ध दो सकता तो उसकी श्राड़ लेने में उन्हें संकोच था। अपने साम्राज्य को द्वानि पहुँचाते हुए कभी-कभी उन्होंने रियासतो जनता के ह्वित को भी बात की, तथापि यह स्पष्ट है कि रियासती जनता की चिन्ता उनका मुख्य लक्ष्य नहीं रह्या। जनता में श्रपने हित की भावना क्‍यों और किस प्रकार जाणत हुई, और उसने इस विषय में क्या-क्या कदम उठाया, यह श्रगलले प्रृष्ठों में बताया जायगा |

टेटे:अ डूब

दूसरा अध्याय अह्गरेजी राज़ में राजाओं का स्वेच्छाचार

अंगरेजों की सावभोभ सत्ता स्थापित होने पर लोगों के ह/थ से विद्रोह का सामथ्य छिन गया और ज्यो-ज्यों राजा अंगरेजों से दचते गए त्यों त्यों वे प्रजा की उपेक्षा करने लगे

--रामनारायण चौधरी

पहले राजाओं को जनता की इच्छाओं का लिहाज

करना पड़ता था- जब तक भारतवष में अंगरेजी राज्य की जड़ नहीं जमी थी, यहाँ राजाश्रों की जनता की इच्छाश्रों श्रौर श्रावश्यकताओं का बहुत लिद्दाज करना पढ़ता था। बात यद्द थी कि राजाश्रों की समय- समय पर आपस में लड़ाई होती रहती थी और कभी उन्हें बाहरी शत्र ओर का भी मुकाबला करना पड़ता था। इस काम के लिए उन्हें

अज्गभरेजी राज में राजाश्रों का स्वेच्छाचार ]

धन जन की ज़रूरत द्वोती रहती थी, औ्रौर झपनी प्रजा से यह सहायता प्राप्त करने के लिए राजाशं के लिए आ्रावश्यक् था कि वे जनता के अ्रभाव श्रमियोगों की तरफ काफी ध्यान दें, श्रोर अपने शासन- प्रबन्ध से उसे संतुष्ट रखें। किसी राजा का ब्यवहार ठीक होने की दशा में उस राजा को यह श्राशंका रहती थी कि प्रजा किसी दूसरे राजा या बाहरी शत्र सेन मिल जाय उस समय प्रजा हृथियारबन्द थी | उसके ह्वाथ में यद्द ताकत थी कि वह दुर्व्यवह्वारया कुशासन करने- वाले राजा के विरुद्ध सफलतापूवंक बगावत करे और उसे गद्दी से उतार कर उसक+ जगह दूसरे ब्यक्ति को राजा बनादे |

अंगरेजी राज में राजाओं द्वारा जनता की उपेक्षा-- जब अंगरेजों की प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से सारे भारत पर हुकूमत जम गई, और सभी राजा उनके श्रधीन हो गए, तो इससे यह लाभ तो हुश्रा कि श्रव राजाश्रों की एक दूसरे से लड़ाई होनी बन्द हो गईं, और उन्हें बाहरी शत्रओं का भी भय रहा | अ्रत्र वे बेफिक्री का जीवन बिताने लगे | पर इसका परिणाम रियासती जनता के लिए बड़ा श्रनिष्टकारी हुश्रा | राजाश्रों की श्रत्न तो जनता का कुछ भय ही रहा, श्रौर उन्हें उसकी सहानुभूति श्रौर सहयोग की श्रावश्यकता ही रही। वे उसकी उपेक्षा करने लगे | यदि उन्हें किसी बात की चिन्ता रही तो सिफ अपने अंगरेज प्रभुश्रों के कृपा-पात्र बने रहने की। राजाश्रों ने समक लिया कि जब तक अंगरेज श्रघिकारी हमसे प्रसन्न रहेंगे, हम सुख की नोंद सो सकते हैं | प्रजा हमारा बाल बाँका नहीं कर सकती |

रियासती अत्याचार--वद्यपि व्रिटिश भारत में मी नौकरशाही ने समय-समय पर ऐसे श्रत्याचार किये हैं, जो सम्थ शासन के लिए कलंक है, तथापि देशी राज्यों में होनेवाले श्रत्याचार उनसे बढ़-चढ़

ध्धर [ जन-जायति

'कर रहे हैं | इनका श्रनुमान बाहरवाज्ञों को आसानी से नहीं होता, 'मुक्त-भोगी ही इन्हें जानते हैं | यहाँ तक छि रियातती अत्याचार! एक 'विशेष श्रर्थ सूचक शब्द हो गया है। गश्रधिकांश रियासतों का देरा के दुसरे भागों से बहुत कम सभ्प$ रहा है, रेल तार डाक श्रादि की यथेष्ट ब्यवस्था होने से श्रामदरफ़्त श्रोर यातायात की सुविधा नहीं है। इतलिए रियास्तो में होमेवाले श्रत्याचारों का बाहरी तुनिया को पता 'नहीं लगता श्रनेक श्रादमी कई-कई वध घोर कष्टों का जीवन बिताते और श्रन्त में मर जाते हैं ता भी थोड़ी दूर रहनेवालों को उनका हाल मालूम नहीं होने पाता | रियासतों में लिखने-बोलने की आजादी बहुत कम रही है, फिर समाचारपत्र निकालने की बात ही क्या | इस समय विविध-कारणांँ से देश में इतनी जाणति हो जाने पर मी अधिकांश रियाततों में घोर अ्रन्धकार है, और वहाँ के श्रंघकार की बात दूसरों की जानकारी में बहुत कम श्ापाती है | इससे सहज ही अनुमान हो सकता है कि पहले कैसी स्थिति रददी होगी | श्रादमी भीतर ही भीतर कष्ट पा रहे थे; घुट-घुट कर मर रहे थे, श्रोर मरने से भी बुरी हालत में जिन्दगी के दिन काट रहे थे, पर उनकी पुकार उनके 'दूधरे भाई नहीं सुन पाते थे | कुछ साहसी कारयंकर्ता बहुत संकट मेल, कर, श्रपनी जान जोखम में डालकर इस बात का प्रयत्न करते थे ऊ्रि रियासती जनता पर होने वाले श्रत्याचारों पर प्रकाश डाले | पर उनका यथेष्ट रुज़ठन होने से उन्हें विशेष सफलता मिलती | ब्रिटिश सरकार की नौति-...तन्‌ (८४७ के भारतीय स्वत॑- बता युद्ध में अंगरेजी राज के लिए, भारी सड्डट उपस्थित हो गया था श्ंगरेजों का राज समाप्त द्वो जाने का प्रसड़ श्राया था। पर देशी शजाझ़ों में से श्रधिकांश ने अंगरेज शासकों के प्रति वफादारी दिखाई, झोर भारतव५ को स्वाधीन होने का अवसर दिया राजाश्रों के इस. व्यवहार ने भारतवर्ष का भावी इतिहास बहुत समप के लिए अंधकार-

अद्गरेजी राज में राजाओं का स्वेच्छाचार ] 4

प्रय बना दिया | अष्तु, जब कि अंगरेज उहले देशी राज्यों को समान करने औ्रोर राजाश्रों को पदच्युत करने में लगे हुए थे, सन्‌ १८:४७ से उन्दोंने समक लिया # देशी रियासतों ह# अंगरेजो राज्य में पिन/ना इतना लाभदायक नहीं है, जितना उन्हें बनाये रखना | राजा मद्ा- राजाओं द्वारा रिवासती जनता के जन-घन. का खूब शोषग किया जा सकता है, श्रोर इस कार्य की जिम्मेवारी से भो बचा रहा जा सकता है | कारण, रियासती जवता के सामने उस पर सख्ती या श्रयाचार करनेवाले के रूप में राजा और उसके कमंचारी ही आते हैं, जब कि वाघ्तव में सब्र काम अंगरेज प्रभुश्रों -के इशारे पर या सहमति से होता है। ब्रिगेश सरह्नार ने देशी राज्यों में श्रदस्तज्षे। की नीति बर्ती, इधका श्रर्थ यही था कि राजाध्रों को प्रता से मनमानी करने की बहुत- कुछ छूट दे दी। जब तह कोई शाज। सरकार को खुश रख सके, वह अपने राजछुत्र और ऐश्वयं के साधनों को सुरक्षित समक सकता भा अगर उपके दुव्यंवद्ार से पीढ़ित होइर जनता उसके विदद्ध सिर उठाने का साहस करे तो ब्रिटिश सरकार की फौज और संगीनें राजा की मदद के लिए मौजूद थीं

कभी-कभी कुछ श्राइमी जो बहुत अधिक खताये जाते, या जो उनके रिश्तेदार आदि होते, किसी तरह अपनी फरियाद अ्रंगरेज श्रधिकारियों फे पास इस आश।! से पहुँचाते कि ऐवा करने से कुछ सुधार होगा कुछ दशाश्रों में साइसी लोऋसेवो कार्यकर्ता बहुत उद्योग करके राजनीतिक विभग के अऊृत्रों के सामने राजाश्रों के दुष्कयों का भंडाफोड़ करते, पर इसका भी कुछ श्रच्छा नतोजा निकन्नना निश्चित था | बात यह थौ कि जहाँ तक जनता का सम्बन्ध था, प्रायः राजा और अंगरेज श्रधिकारियों में 'मिज्ञी भगत थी; चोर-चोर मोसेरे भाई! को कहावत चरितार्थ होती थो। यह शंका रहती थी कि राजा के विरुद्र शिकायत ऋरनेवाले कार्यकर्ता के खिवाफ

१० [ जन-जाणति

दी कोई कड़ी कारवाई हो जाय, श्रथवा उसका नाम राजा को मालूम हो जाने पर बह उसका रियासत में रइना द्वी दूभर कर दे

गाजाओं का स्वाथेसाधन; कमचारियों का शोचनीय

सहयोग---श्रधिकांश राजाशं ने यह नीति इख्त्यार की कि जनता से ग्रधिक-से-अधिक द्रव्य प्राप्त करना, उससे स्वयं भी मौज उड़ाना, और साथ ही अपने अंगरेज प्रभुश्रों को भी संतुष्ट करना राजाश्रों को अपने इस स्वार्थसाधन के लिए कुछ खुशामदी, जी-इजुर, नीति-द्दीन श्रोर कठोर कर्मचारियों के सहयोग की श्रावश्यकता थी; दुर्भाग्य से इनकी कमी रही फितने ही आदमी श्रपनी सेवाएँ श्रर्पण करने- वाले मिलते २ह्दे | श्रगर एक पदाधिकारी ऐसे काय को अपनी श्रात्मा के विरुद्ध मान कर छोड़ता तो उसकी जगह भरने के लिए कई-कई आदमी उम्मेदवार द्ोते ; श्रोर श्रगर संयोग से कोई स्थानीय आझादमी अपने भाइयों पर काफी जोर जुल्म कर सकता तो राजा के लिए चाहरी आदमी बुलाने का' रास्ता खुला हुश्रा था ; फिर इस काम में अर्थात्‌ (योग्य व्यक्ति के चुनाव में मदद देने के लिए. राजनीतिऋ विभाग दरदम तैयार था।

जनता के अभावों और कष्टों की वृद्धि-रेजीडेंटोी. शोर पोलिटिकल श्रफसरों की भ्रधीनता श्रौर नियंत्रण में रहते हुए राजा लोग जनता को अपने निजी भोगविज्ञास और श्रपने अंगरेज प्रभुओ्रों के स्वार्थ- सिद्धि का साधन मात्र समझने लग गये वे राजधर्म को भूल गये औ्रौर प्रजा के प्रति वात्सल्य और प्रेम-माव जाता रहा। श्रब राजा ने प्रजा को पुत्रवत्‌ समझा, श्रोर उससे गेर श्रादमी का सा व्यवद्दार किया | राजा को इस बात की चिन्ता रही कि मेरे राज में जनता की शिक्षा या स्वास्थ्य ग्रादि की ब्यवस्था कैसी है, तथा उसका निर्वाह भी ठाक: तरह होता है या नहीं, फिर जनता की दूसरी श्रावश्यक्षताश्रों

श्रज्गधरेजी राज में राजाश्ं का स्वेच्छाचार ] ११

की पूरा करने की तो शत ही क्या! ऐसी स्थिति में जनता के भावों और कृष्टों का बढ़ना स्वाभाविक ही था। इस विषय की खुलासा चर्चा अ्रगले अध्याय में की जायगी | यहाँ पाठकों का ध्यान इस बात कीं श्रोर दिल्लाना है कि भारतवष में अंगरेजी राज की जड़ मज़बूत होने में राजाश्रों का बढ़ा भाग रहा है, और अंगरेजो राज में राजाओं का पद चाहे जैता नगण्य होता गया, उन्हें श्रपनी प्रजा के साथ स्वेच्छाचार करने की चहुत घुविधा ओर प्रोत्साहन मिला |

“लन्दन टाइम्प' की साक्षी--दस विषय में स्त्रयं अंगरेजों के प्रसिद्ध पत्र 'लन्दन टाइम्स” के सन्‌ १८५३ में लिखे हुए लेख का नीचे दिया हुश्रा अंश बहुत विचारणीय है। उकने लिखा था “पूर्व के इन निध्तेज और निक्रम्मे राजा नामधारियों को जिन्दा रखकर हमने उनके स्वाभाविक अन्त से उनको बचा लिया है। प्रजाजन बगावत के द्वारा अपने लिए एक शक्तिशाली और योग्य नरेश दूढ़ लिया करते हैं। पर जहाँ श्रत्र भी देशी राजा है, इमने वहाँ के प्रजाजनों से यह सुविधा श्रौर ग्रधिकार छीन लिया है | यह इल्जाम सद्दी है कि हमने इन राजाओं को सत्ता तो दे दी, पर उसकी जिम्मेदारी से उन्हें बरी कर दिया।. अ्रपनी नपुसकता, दुगु और गुनांहों के बावजूद भी केवल दमारी' तलवार के बल पर ही वे अपने सिंह्यासनों पर टिके हुए हैं | नतीजा यह है कि श्रधिकांश रियासतों में घोर श्रराजकता फेली हुईं है | राज्य का कोष किराए के टटढू जैसे सिपाहियों श्रौर नीच दरबारियों पर बरबाद हो रद्दा है, और गरीब रियाया से बेरहमी के साथ बसूल किए गए भारी करों के रुपयों से नीच-से-नीच मनुष्यों को पाला जा रहा है श्रसल में अन्र यह तिद्धान्त काम कर रहा है कि सरकार प्रजा के लिए नहीं, प्रजा ही राजा श्रौर उसके ऐशोश्राराम के लिए है, ओर यह कि जब तक हमें राजा की सत्ता और उसके सिद्दासन की रक्षा करना श्रभीष्ट हे,

श्२ [ लन-जागृति

तव तक हसें भी भारत की सर्वोच्च सत्ता के रूप में वे तमाम बातें करनी ही होगी, जो ऐसे राजा श्रपनी प्रजा के प्रति करते हैं|”

ये पंक्तियाँ श्रत्न से लगभग सौ पहले की है, जर कि यहाँ ईनट इंडिया कम्सनी का शासन था; परन्तु ये भारतवर्ष का शासन ब्रिटश पालिमेंट के द्वाथ में जाने के बाद की स्थिति को भी सूचित्र करतो हैं, यहाँ तक कि भारत में अ्ंगरेजी राज सम्रान्न द्ोने के समय तह भो इनमें बहुत कुछ सच्चाई रही |

लल्न्ध्र्श्ट्भर

तीसरा अध्याय जनता का असन्तोष

प्रथक राजकुमार -काल्षिपम्रों में उनको शिक्षा, योरोपियन शक्षकों के नीचे उनका प्रारम्भिक पालन-पोषण, प्रसाइ-जीवन का प्रभाव तथा देश के जन-जीवन की विश्तीणं घाराओं एवं अपने राज्यों की जनता से उनकी विरक्ति--इन सब कारणों से राजाझों में और राष्ट्रीय भारत के नेताओं में एक चौड़ो खाई बन गई --वलबन्तराय मेहता

अंगरेजी राज़ में गजाशों की स्वेच्छाचारिता के साथ जनता का झसन्तोष बढ़ानेवाले अ्रभाव अ्रभिषोग बढ़ते गए पहले उद्योग-धैधों वा विचार कर |

उद्योग-धंधों का नाश-लोगों की आजीविका के मुख्य साधन 'ये होते हँ--कारौगरी, व्यापार और खेती देशी राज्यों में इन सभी

जनता का श्रसन्ताष ] भ्हे

साधनों पंर भारी श्राघात पहुँचा | कुछ इने-गिने राज्यों को छोड़कर इरेक राज्य अयनी कितनी ही श्रावश्यक्ताशों के लिए परावलम्त्री ही गया | दियासलाई, बतंन, युई श्रादि बहुत सी चीजें तो राज्य में बनती ही थीं, और कपड़ा या शक्कर श्रादि जो चीजें बनती भी थीं" दे इतने अरिमाण में नहीं बनती थीं कि राज्य के सब लोगों की ज़रूरतें पूरी हो सकें | इसका कारण था | राज्य की श्रोर से इन चीजों को बनाने की कारीगरी श्रौर उद्योग-घंधों को कोई प्रोत्साइन मिला; इसके विपरीत, अंगरेज श्रफस़रों श्रोर सरकार को खुश करने के लिए राज्य में विदेशी माल की आ्रायात बढ़ाने की विविध चेष्टाएँ की गईं

कपड़े में परावलम्बन--कपड़े को बात लीजिए | जो भारतवर्ष दूसरे देशों की जनता के लिए कपड़ा देकर उनके शेर ठकऊता था, अंगरेजों के शासनकाल में खुद अपनी हीं ज़रूरत पूरी करने के लिए दूसरों का मुह ताकने वाला हो गया | इस प्रकार इस देश के दूसरे हिस्सों की तरह रियासतो में भी कण्ड़े का कारोच्रार चोयट हो गया गाँव-गाँव में विलायती कथड़ा पहुँचने लगा। साथ ही रेजीडेंटों श्रादि: के प्रत्यक्ष नहीं तो परोक्षु दधाव के कारण राज्ाश्रों ने भी इसे प्रोत्साइन दिया राजा लोग खुद विलायती कपड़े पहनें तो उनके '(स्व्राभिभक्त! राजकमचारी तथा खुशामदी रईतह आदि उनका श्रनुकरण करने वाले ठहरे साधारण जनता बहुत कुछ मजबूरी से विलायतो कबड़े का इस्तेमाल करने लगी | यहाँ तक कि गाँव की त्लियाँ तक विदेशों कपड़ा पहनने की भ्रादी हो गईं, श्रादमी तो साफे औ्रौर धोती आदि विदेशी पहनने ही लगे।

नमक ओर चीनी आदि की बात--नमक की कहानी तो बहुत ही दर्दनाक हे। भारतवर्ष की श्रनेक रियासतों में समुद्री तव या मील शआ्रादि होने से यहाँ नमक काफी परिमाण में होता था; श्रादमी श्रपनों

१४ [ जन-जागति

ज़रूरत के लिए इसे खुद ही बना सकते थे। इस प्रकार इस पदार्थ को दूर से लाने या मंगाने का सवाल दी नहीं उठता था पर अंगरेज सरकार ने श्रपने स्वार्थ के ज्िए देशी राज्यों से ऐसी सन्वियाँ कर लीं कि वहाँ के आदमी नमक बना सकें। देश भर के नमक के व्यापार का एकाधिकार मारत-सरकार को रह गया। वह बहुत सा नमक विदेशों से भी मंगाने लगी। श्रौर नमक के मंड्ार के पास रहने वाली रियाढती जनता श्रपनी इस जरूरत को पूरा करने के लिए उसके श्राश्रित हो गई। नमक आदमी के भोजन का एक श्रत्यन्त ग्रावश्यक पदाथ होने से, गरोच्र से गरीब आदमी को भी इसकी जरूरत होती हे | इस तरह परावलम्बन की बात रियासती जनता की नीचे से नीची सतह तक पहुँच गयी; उसकी दशा '्सपर॒द्र में भौमीन प्यासी! की हो गई | नमक बनाने वाले अ्रसंख्य ग्रादमियों का धन्धा मारा गया, श्रोर वे दूसरी मेहनत मजदूरी करने पर मजबूर हो गए,

इसी प्रकार, बहुत सी रियासतों में चीनी या शक्कर सिर्फ उन रियासतों से बाइर की, बल्कि भारतवर्ष से भी बाहर की मगाई जाने लगी | व्रिटिश सरकार ने विदेशी कल कारखाने वालों श्रोर जद्ाजी कम्पनियों को सुविधा देकर यहाँ विदेशी चीनी के श्राने और खपने का रास्या साफ कर दिया |

जनता की भयंकर निर्धनता--इस प्रकार एक श्रोर तो उद्योग धन्धों के नष्ट होने से लोगों को श्राजीविका के साधनों की बहुत कमी हो गई दूसरे, विज्ञायती पदार्थों की खरीद बढ़ने से श्रधिकाधिक धन विदेशों को जाने लगा। इससे देश में नि्धनता उत्तरोत्तर बढ़ती गई कुछ ऊँचे दर्ज के राजकर्मचारी, जमींदारों श्रौर सेठ साहुकारों को छोड़कर सर्वाधारण की श्राथिक स्थिति बहुत शोचनीय दो गई | देशी राज्यों की निर्धन जनता की स्थिति या तो भुक्त-मोगी हो जानते

जनता का श्रसन्तोष ] १४

हैं, या वे लोग समझते हैं जो उनके निकट सम्पकक में रहते हैं ! दुसरे आदमी उसका ठीक श्रनुभान नहीं कर पाते। देशी राज्यों में राजपूताने की, ओर उसमें भी खासकर मीलों की दशा उनके दी सजातीय भील अ्रध्यापक भ्री-प्रेमचन्दर जी के शब्दों में सुनिए-- “कपड़े के श्रभाव से बहुत सी जगह खत्नियाँ आधी लज्जा भी नहीं ढक सकती ओऔ्रौर पुरष एक लंगोटी और पछोड़े के सहारे दिन, श्ौर श्राग के सद्दारे रात काटने पर मजबूर होते हैं। श्रोढ़ने-बिछो ने की कमी के कारण कई बच्चे एक ही फटी हुई तार-तार गुदड़ी में पड़े रहते हैं; नहीं-नहीं, कहदीं-क्दीं खाद की रोडियों में गढ़े खोदकर उनमें बच्चों को ठ'ंस कर ऊपर से ढक दिया जाता है। हम लोगों को ज्रदस्ती गरीत्र श्रोर मूर्ख रख कर भा संतोष नहीं क्रिया जाता, बल्कि गाँव में शरात्र के ठेके की दुकान खोलकर राज्य ने हमारे लिए, दुराचार का खासा प्रलोमन कर रखा है। सफाई और अ्रन्नतरस्र काफी मिलने के कारण श्रधिकांश भील दुब औ्रौर रोगी रहते हैं प्लेग, इन्फ़्लुएंजा श्रोर हैज़े के समय तो घर के घर खाली हो जाते हैं। राज्य की तरफ से उन्हें कोई मदद या श्रोषधि नहीं मिलती ।?* यह बात उदयपुर के भीलों के सम्पन्ध में कही गई है। याद रहे कि इन जंगली जातियों के सहारे ही उदयपुर राज्य को नींव रखी गई, ओर इन्होंने समय-समय पर इस राज्य की रक्षा की है। तिस पर भी इनकी यह दशा है ! फिर दूसरी जातियों के आ्रादमी राज्य से क्या आशा करें। श्रोर जो बात उदयपुर की है, वही थोड़े बहुत भेद से चहुत से दूसरे राज्यों की श्रधिक्रांश जनता की है

असन्तोष के अन्य कारण; अशिक्षा-जनता के अ्रसन्तोष के श्रन्य कारणों में अ्शिक्षा मुख्य हे | श्रधिकतर राजाप्रों ने जनता को

*(भ्री, पथिक जी का बयान” से

रद | जन-जा गत

शिक्षित करने की ओ्रोर घोर उदासीनता रखी उनकी यह धारणा रहीं कि अशिक्षित जनता पर मनमानी हुकूकत हो सकती हे; पढ़-लिख कर श्रादमी शानवान हो जायगे तो वे अधिकारों फो समझने लगेंगे, श्रोर उनको प्राप्त करने का श्रान्दोलन करंगे | इस लिए सावंजनिक शिक्षा का प्रचार करना चाहिए | ऐशी विचार-धारा बह्दुत श्रनिष्कारी होती है। अभ्रगर जनता शिक्षत होकर शासन-प्रचन्ध में अपने अ्रधिकार चाहती है तो क्‍या बुरा है ! राजाश्ों को चाहिए था कि वे जनता को संतुष्ट करके श्रपना बल बढ़ाते शिक्धित जनता राज्य की रक्षा श्रोर उन्नति के लिए तरह-तरह का त्याग कश्ने और कष्ट उठाने के लिए स्वयं तैयार रह्दती है, जब कि श्रशिक्षित आ्रादमी श्रपने-श्रपने स्वार्थ साधन में लगे रहते हैं, श्रोर राज्य के प्रति श्रपने कतंव्यों का पालन नहीं करते | उनमें दुब्यंसन और पारस्परिक लड़ाई-मगड़े बहुत होते हैं, जिनके नियंत्रण में राज्य को चहुत शक्ति लगानी पड़ती है; पुलित श्रोर अदालतों का खर्चे बढ़ जाता है। इसके अलावा राज्य में शिक्षित व्यक्ति कम होने से शासन-प्रइन्ध के लिए योग्य श्रादमी कम मिलते हैं; जो मिलते हैं वे सेवा-भाव से काम करनेवाले नहीं होते, वरन्‌ अपना स्वार्थ सिद्ध करने वाले, रिश्वत श्रादि लेकर जनता का भार बढ़ाने वाले होते