प्रकाशक

रामलाल पुरी संचालक

ग्रात्माराम एण्ड सस काइ्मीरी गेट दिल्‍ली-६

इसरा संस्कररा

मुद्रक भघीज्ञ प्रेस दावडी बाजार दिल्‍ली-६

भारतीय साहित्य, संल्छति और राजनीति के मनस्वी साधक श्री द्वारिकाप्रसाद जी मिश्र को जिन्होंने राष्ट्रीय जीवन-दर्गन और जीवन-चर्या के साथ विश्व-स्तमाजवाद वी आवुनिक कन्पना को आ्ाश्रय दिया है

अवपिकथन

हिन्दी में साहित्यिक अ्रनुशीलन का कार्य बहुत-कुछ सुनिद्दितत गति से आगे बढ रहा है भ्ाधुनिक यूग के आरम्भ में हमारे अ्नुशीलन की दिशा स्पष्ट थी। साप्रदायिक और परपरावादी दृष्टियों का प्राधान्य था पारित्य की प्रचुरता तो थी, परन्तु उसका प्रयोग अधिकतर थास्त्रार्थी-पद्धति पर किया जा रहा था | लोग बाल की खाल अधिक निकालते थे यदि किसी दाशंनिक मतवाद का प्रइन उठा, तो सूक्ष्म-से-सूक्ष्म सूत्रों का ऊहापोह होने लगता पाडित्य के बल पर लोग अपने-अपने पक्ष की प्रतिष्ठा और विपरीत पक्ष का निरसन करने लगतें | एक ही ग्रथ के भीतर दवैत, श्रहत, विशिष्टाद्वैत, हंतादैत आदि के बहुमुखी सिद्धान्त ढूँढे जाते थे 'रामचरितमानस' के अन्तर्गत इन विविध मतो की स्थापना की गई यदि साहित्यिक चर्चा उठी तो अ्लकारो के लक्षणों और भेदो मे ही पडितो की प्रतिभा टकराने लगी। भाषा-सम्धधी शोधों में भी पुरानी परपरा का भ्रनुसरण होता रहा इस सम्पूर्ण आरम्भिक शोध में सृस्पष्ट दृष्टिकोण, प्रणाली और लक्ष्य का अ्रभाव था

अनुशीलन-सम्बन्धी एक नया अध्याय तब आरम्भ हुआ जब पश्चिचमी पडितो की छत्र-छाया में भारतीय पडित भी प्राच्य-प्रनूसधान (0त67र। , 2080७) के काये में सलग्न हुए परन्तु इन पडितो की सबसे वडी कमी यह थी कि वे अपने पद्चिमी अभिभावको द्वारा बाँधी गई लीक से वाहर निकलने में श्रसमर्थ थे। यत्र-तत्र देश-प्रेम या राष्ट्रीय भावना से प्रेरित होकर वे पद्िचमी पडितो के निर्णयो में थोडा-बहुत परिवत्तन कर देते थे, पर इससे अधिक नही लोकमान्य तिलक की भाँति एकदम नया निर्देश करने वाले व्यवित विरल थे और पांडित्य के क्षेत्र में विद्रोही माने जाते थे यह नई पडित-मडली राष्ट्रीयता की प्रतिनिधि मानी जाती थी, परन्तु उसके कार्यों मे पावचात्य अनुकृति का तत्त्व ही प्रमुख था। हम यह नहीं कहते कि भारतीय साहित्य के परिचमी विवेचको से हमने कुछ पाया ही नही--हमारा अनुृशीलन लाभान्वित ही नही हा, परन्तु हम यह अवद्य कहेगे कि भारतीय वस्तुओं को पश्चिमी निगाह से देखने वाले लोगो में एक मौलिक दृष्टि-दोष तो था ही

प्रियसेन और उनके भारतीय अनुयायियो ने भाषा और साहित्य-सम्बधी अनुशीलन की एक नई प्रणाली निकाली और एक नवीन परम्परा स्थिर की। परत्तु इन अन्वेषको के हारा-भी हिन्दी का साहित्यिक भ्रनुशीलन पूर्णत राष्ट्रीय

द्‌ भमहाकवि सूरदास

श्रथवा वैज्ञानिक भूमि पर प्रतिष्ठित हो सका साहित्यिक मानदंड भी बहुत- कुछ अनिदिष्ट ही रहे उदाहरण के लिए मिश्र बन्चुओ की साहित्य-समीक्षा और गन्वेषणो को देखे, तो उस शैली की सारी नवीनता अपनी समस्त दुर्वल- ताझ्रो के साथ हमा रे समक्ष जाती है। मिश्र बन्धुओ को हम ग्रियर्तन-अनुयायी समीक्षक ही कह सकते है, यद्यपि अपनी श्रन्नेक त्रुटियो के लिए वे स्वयं ही जिम्मेदार है

आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी और आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के अश्रवतरण से हिन्दी की साहित्यिक दृष्टि एकदम सेंवर उठी द्विवेदी जी युग-द्रष्टा थे और शुक्ल जी थे साहित्य के सच्चे भाव-द्रष्टा दोनो के समागम से हिन्दी की साहित्यिक चेतना बहुत-कुछ परिपुष्ट हो गईं शुक्ल जी ने हमा रे साहित्यिक अनशीलनो को नई प्रेरणा दी उनकी दृष्टि पुर्णंत. सांस्क्ृतिल और शालीन थी वे शक्ति, शील और सौन्दर्य के उपासक थे उन्होने हिन्दी-साहित्य का धारावाहिक्न विकास-क्रम दिखाकर हमें श्रेष्ठ कवियों का परिचय कराया उनकी दृष्टि मुख्यतः भावात्मक और साहित्यिक थी, झतएव वे श्रन्य दृष्टियों से महत्त्वपूर्ण कार्य करने वाले लोगो का स्वागत करने को तेयार थे। जाथ ही उनका अ्रनुशीलन विशुद्ध शास्त्रीय अथवा ऐतिहासिक भूमि पर ग्रधिष्ठित था वे साहित्य के महान्‌ उत्नायक और प्रेरक थे, कदाचित्‌ इसीलिए तटस्थ भ्रनुशीलन की लीक पर चलने में वे असमर्थ भी थे

उदाहरण के लिए शक्ल जी के भविति-प्तम्बन्धी विवेचनों को देखिए भक्ति का विकास दिखाते हुए उन्होने जो चर्चाएँ की है, वे तो दाशनिक दृष्टि से श्ीर ऐतिहासिक क्रम के अनसार अत्यन्त प्रामाणिक या शास्त्र-समस्त है उनके समस्त विवेचन उनकी अपनी सदभावनाओं पर आश्रित हू, यद्यपि शास्त्र का नामोल्लेख भी वे करते गए हैँ भक्ति और धर्म श्रादि की जो परिभाषाएँ उन्होने की है, वे उनकी स्वतन्त्र रुचि की परिचायक हैँ यद्यपि शुक्लजी का यह समस्त विवरण अतिशय उदात्त और रोचक है, परन्तु पूर्णत तटल्थ और प्रामाणिक नही साम्प्रदायिक भर परम्परागत विवेचन-पठ्धति से छुटकारा देने और एक व्यापक मानव दृष्टिकोण का सस्थापन करने में शुवलजी समर्थ हुए, परन्तु उनकी व्याख्याओ और विवेचनों में इतिहास-सम्मन तथ्यो का उद्घाटन सर्वेत्र नही पाया जाता

साहित्यिक कृतियों और साहित्य-थास्त्र की पद्धतियों का निरुपण करने में भी शुज्नजी ने श्रनाधारण अन्‍न्तदु प्टि का परिचय दिया है। सच पूछिए तो रस, झलंकार, रीति, वक्रोवित आदि सम्प्रदायो की जो व्याख्याएँ आज प्रचलित हू

प्राक्कथन गा

बे प्रमुखत शुक्ल जी द्वारा ही उद्भावित हैं। इस क्षेत्र में भी शुक्ल जी का कार्य पूर्णत शास्त्र-सम्मत नही है, परन्तु यहाँ वे अधिक मनोयोग पूर्वक शास्त्र-पक्ष का प्रनशीलन कर सके है रीति-काल की वेंधी हुई परिपाटी से साहित्य-शास्त्र की मुक्ति कराने का श्रेय हिन्दी की सीमा में शुक्ल जी को ही प्राप्त है, परन्तु शुक्ल जी के व्यक्तिगत मतो और श्राशयों से यह क्षेत्र भी शून्य नही है कवियो और कृतियो की धारावाहिक समीक्षा करने में शूवल जी ने एक नई ही पद्धति का आविर्भाव किया, जिसे हम शुवल-पद्धति ही कह सकते है शक्ल जी की समीक्षा-दृष्टि श्रतिशय मामिक थी, परिणाम-स्वरूप उनकी समीक्षात्रो ने जो साहित्यिक चेतना उत्पन्न की वह पर्याप्त विशद श्रोर स्वस्थ थी एक नया मानदड शुक्ल जी ने सस्थापित कर दिया, जिसके आधार पर हिन्दी-समीक्षा उत्तरोत्तर उन्नति /करती रही है वास्तव में शुक्ल जी का समस्त कार्य नवयुग के सच्चे साहित्याचार्य का कार्य है। उन्होने स्वत एक नवीन समीक्षा-घारा का प्रवर्तेत किया उन्हे किसी प्राचीन मत का उद्घाटक या विश्लेषक-मात्र मानना उचित नहीं इसीलिए शुक्ल जी की दी हुई समस्त नई विधियो का इतत्न होते हुए मी उन्हे ऐतिहासिक अन्वेषक ग्रथवा शास्त्र- प्रवक्‍ता को वस्तुमुखी प्रामाणिकता नही दी जा सकती हिन्दी-अनुशीलन शूकक्‍्ल जी का ऋणी है, परन्तु इसरे रूप में उन्होने अनुशीलन-कार्य को नई चेतना दी, नया मार्ग-निर्देश किया। शुक्ल जी के प्रनुशीलनो में दाशनिक और साहित्यिक निष्पत्तियाँ, सैद्धान्तिक और व्यावहारिक समीक्षाएँ, एक ही भूमिका पर प्रतिष्ठित हे ज्ञान के अनेक क्षेत्रों में शुक्ल जी एक ही दृष्टि लेकर गए--वह दृष्टि थी भावात्मक श्र सास्कृतिक अनुसधान के विभिन्‍न विषयो को एक-दूसरे से पृथक्‌ मानकर उनमें श्रलग-अलग दृष्टियो से प्रवेश करना शुक्ल जी को अभीष्ट था कदाचित इसीलिए उनकी उपपत्तियो और विवेचनो में ऐतिहासिक वस्तुमत्ता और छोटे-से-छोटे विवरणो की खोज करने की प्रवृत्ति नही है। सक्षेप मे उनके अनुशीलन का आधार व्यायक और एकरस है, विभाजित और श्रेणीबद्ध नहीं वे सीमित विशपज्ञता (896००थाडशध्र०) के मार्ग पर कभी नही चले शुक्ल जी के पदचात्‌ हिन्दी-प्रनुशीलसल की शैली और विधि बदलने लगी है साहित्य के दाशनिक, सास्क्ृतिक भ्रथवा कला-पक्ष की स्वतत्र और एक दूसरे से असपृक्त मीमासा होने लगी है कुछ समीक्षक किसी एक तथा कुछ किसी दूसरे पक्ष को प्रमुखता देने लगे है। साहित्यिक विवेचना में वे सैडान्तिक हो या प्रयोगात्मक, नई व्यापकता आती जा रही है हिन्दी के श्रधिकाश विवेचक्‌

पर महाकवि सूरदास

साहित्यिक श्रनुशीलन को अ्रधिक महत्त्व दे रहे है कुछ ने सास्कृतिक और दाशनिक पक्षों तथा कुछ ने समाज-शास्त्र भर इतिहास के तत्त्वो को प्रमखता दे रखी है कुछ थोडे से लोग भापा के क्षेत्र में भी काम कर रहे हैं

यद्यपि शुक्ल जी की भाँति विविध विषयो और पक्षो को समग्र रूप से लेकर चलना आज के साहित्यिक श्रध्येता के लिए तो सभव ही है शौर भ्रावश्यक ही, परल्तु भ्रप्रत्यक्ष रूप से हमारी साहित्यिक चेतना हमारे समस्त

अनशीलनो में सजग और सर्तेंक रहनी चाहिए, अन्यथा हम साहित्य-सम्बंधी मलवर्ती सास्कृतिक दुष्टिकोण को खो बेठेगे, जो एक शअ्रत्यन्त हानिकर वात होगी कला के लिए कला' की भाँति 'अनुशीलन के लिए अश्रनृशी लन' की पीठिका हमारे लिए उपयोगी नही हो सकती हम जिस किसी कार्य में लगे रहे, उसके शआ्रात्यतिक स्वरूप और मूल्य को भूल जायें यदि हमारे भ्रनुशीलनो में यह मूलवर्ती चेतना काम नही करती जो उस अनुशीलन को आशय प्रदान करती है, तो हमारा सारा कार्य यात्रिक हो जायगा और हम ज्ञान-विकास के मूलवर्ती उद्देश्य से भी हाथ धो बेठेगे

साराश् यह कि हमें विषयो और वस्तुओं का सापेक्षिक मल्य भूलकर अ्न्वेषण में प्रवत्त नही होना है। हमारे समक्ष अनसघेय विषय और वस्तु की रूपरेखा स्पष्ट होनी चाहिए। उदाहरण के लिए यदि हम बिहारी या देव क्रे साहित्यिक कृतित्व का श्रनुशीलन कर रहे हैं तो हमारी सारी विद्या-बुद्धि उक्त कवियो के काव्य-रहस्यो को समझने और उनका उद्घाटन करने में भले ही लग जाय, किन्तु हम यह स्मरण रखें कि साहित्य के न्यायालय में उन वि“ की विशेषता और महत्त्व अतिरजित होकर उपस्थित किये जायें।

है कि हम सदेव सत्य के इस सापेक्षिक स्वरूप का स्मरण नही रखते

जिससे केवल हमारे निर्णायों में, प्रत्युत हमारे मापदंडो में भी भ्रान्ति को सभावना वनी रहती है

हमारे साहित्यिक अ्नणीलनो में एक और च्रटि पिछले कुछ समय-से बढती जा रही है। हम श्रनुणीलन तो साहित्यिक कृतियों का करते है, परन्तु हमें साहित्यिक विशिष्टता का ज्ञान नहीं रहता और हम केवल नामोल्लेखो या समयानुक्रम-संग्रहो से ही सतोप कर लेते हे ऐसे अ्नुसधान पूर्णतः श्रसाहित्यिक कहे जायेंगे, क्योकि उनमें तो साहित्य के वेशिप्ट्य को निर्धारित करने वाली कोई माप-रेखा रहती है श्रौर रचना के सांस्कृतिक या कलात्मक महत्त्व पर किसी प्रकार का प्रकादा पडता है जब तक साहित्यिक रचना के वैशिष्ट्य का निरूपण हो--जवब तक हम सजीव साहित्य के समीप पहुँचकर उसे

& पआक्कथन

देखे--तब तक हमारे अनुशीलन का प्रयोजन ही सिद्ध नही होता जिस अकार साहित्यिक कृतियों के मूल्यों की भ्रान्त धारणा श्रनुणीलन का दोष है, उसी प्रकार उनके मल्य के सम्बध की घारणा-रहित खोज भी साहित्यिक अनुशीलन का अपवाद है ऐसे अनुशीलनों से केवल विषय-सूची का काम लिया जा सकता है ऊपर के वत्रतव्य का यह भ्रर्थ नही कि शुबल जी के पथ्चात्‌ हिन्दी मे प्रनशी लन-सम्बधी नया काम हुआ ही नहीं, और हम यही कहना चाहते है कि नए समीक्षक और साहित्यिक अध्येता शुक्ल जी की लकीर ही पीटते जा रहे हें काव्य-कृतियो और काव्य-सिद्धान्तो पर अधिक मब्लिप्ट कार्य भी हुआ है। विशेषकर सैद्धान्तिक पक्ष में पूर्व और पश्चिम के समीक्षा-मानों को एक समन्वित स्तर पर लाने की चेप्टा की जा रही है। बसी प्रकार साहित्य के विविध रूपो और साहित्य-म्रष्ठाओ तथा उनकी कृतियों को उचित सामाजिक और सास्कृतिक पृष्ठभूमि पर परखने का प्रयत्न भी किया गया है। विशुद्ध साहित्य-समीक्षा के स्तर से राहर जाकर कवियों और रचनाकारों के ऐति- हासिक और सास्कृतिक कार्यो और तत्कालीन देश काल पर उनके प्रभावों का विवेचन भी किया जा रहा है। सामयिक साहित्य की समीक्षा में समाज की परिवर्तित परिस्थितियों के श्राकलन के साथ कवि भ्रौर उसकी रचना के मनों- वैज्ञानिक स्वरूप और प्रभाव को परझने की चेप्टा भी की जाने लगी है। साराश यह कि ऐतिहासिक वस्तु-स्थिति, सामाजिक विकास-क्रम, रवयिता के व्यवितत्व ओर विचार-धारा के साथ रचना के मनोवैज्ञानिक और साहित्यिक उपकरणों की अध्ययन सवयुग के समीक्षकों द्वारा किया जा रहा है। नए यग के साहित्यिक अनुशीलन का प्रतिनिधि स्वरूप इन्ही तत्त्तो पर आधारित हे इसी समय, दो नवीन मतवाद प्रतिथ्ठित होने लगे हैं जो हमारे साहित्यिक प्रध्ययत और विवेचन को किस नई दिशा में ले जायेंगे, अभी कहा नहीं जा भेकता भ्रभी इनकी गतिविधि सुनिश्चित नही है सामाजिक विकास और परिवर्तन के तत्त्व को तो नए समीक्षक भी स्वीकार करते है, परन्तु नव्यतम मतवादी वर्ग-सधर्ष के आधार पर होने वाले सामाजिक परिवर्तन की एक विशेष जपरेश्ा निर्धारित करते है भौर उसे को परिवर्तन का मूलाधार मानते है अत विज्वेषना यह है कि ये काव्य-साहित्य को राष्ट्रीय या मानवीय संस्कृति का अपादान ने भानकर केवल विभिन्‍न समयों की वर्गीय सस्कृति का स्मृति-चिन्ह मानते है इस प्रकार साहित्य भौर कलाएँ वर्गीय विकास की सीमा में वेंध जाती है और अपना स्थायी सास्कृतिक मूल्य स्रो बेठती है |

र्‌० महाकाव सूरदास

केवल साहित्य का सृजन उन-उन समयो के सामाजिक यथार्थ, अथवा वर्गीय सघर्प की स्थिति-विजेेप से परिचालित होता है, वह उस समय के सत्ताधारी वर्ग का प्रतिनिधित्व भी करता है और साथ ही उसका प्रचार-प्रसार आस्वादन और उपयोग भी वर्गीय सीमाझओ्रीं से वेष्टित होता है। यदि कोई वर्गीय साहित्य सामान्य जन-समाज तक पहुँचता है, तो उक्त सत्ताघारी वर्ग के ही लाभ के लिए | वह जन-समाज को भुलावे में डालकर अपने वर्गीय या श्रेणी-उद दय की पूर्ति किया करता है

इस प्रकार यह नया मतवाद नीचे लिखे क्रान्तिकारी विचारो को समुख रखता है--१ समस्त साहित्य वर्गंगत होता है, वर्ग विशेष की सस्क्ृति का पोषण करता है और तत्कालीन सामाजिक यथार्थ का ही प्रतिविम्ब हुआ करता है २. केवल वर्गहीन समाज का साहित्य ही सार्वजनिक होता है, शेष सम्पूर्ण साहित्य वर्गो की सीमा में परिवद्ध रहता है। ३. राष्ट्रीय या मानवीय सस्क्ृति नाम की कोई वरतु नहीं होती, केवल वर्गगत संस्क्ृतियां ही हुआ करती है

आरम्भ में यह मतवाद बडी कट्टरता के साथ अपने निर्णयो को प्रस्तुत कर रहा था, परन्तु कुछ समय से यह अ्रधिक संतुलित आ्राधार ग्रहण करने लगा है। अब यह स्वीकार किया जाने लगा है कि यद्यपि साहित्य सामाजिक यथार्थ की उपज है, पर वह सामाजिक यथार्थ लेखक या रचयिता को किसी एक ही विधि से नही, अनेक विधियों से परिचालित करता है, जिसके कारण साहित्यिक कृतियो में अ्रनेकरूपता आती है साथ ही कवि और लेखक अपनी सामयिक बर्गीय स्थिति के प्रति कोई एक ही प्रतिक्रिया नही व्यदत करते, अनेक प्रकार की

प्रतिक्रियाएँ हो सकती है जो उस समय के साहित्य को प्रगतिशील, अप्रगतिशील

इनकी मध्यवर्ती स्थितियाँ देती है इसी के साथ नए मतवादी साहित्य के उन मानवीय और सांस्कृतिक मह्यों को भी स्वीकार करने लगे है, जो वर्ग वाद की कठोर सीमाग्ो को वहुत-कुछ लचीला वना देते है

त्रमथ. यह नया मतवाद अ्रपनी कट्टरता का परित्णग करके हिन्दी-अनु- धीलन की स्वाभाविक परम्परा में श्रपना उपयोगी स्थान बनाने की तेयारी कर रहा है| निः्चदय ही इस नवीन शैली के अनयायी साहित्य की सामा जिक प्रेरणात्नरों का अब्कि विस्तार और वारीकी से अध्ययन करन। कंदाचित जब वे यह कार्य करने लगेंगे तव उनके अनभव और उनकी घारणाएं उन्हें और भी सतुलित और यथार्थ निर्ण्यों तक पहुँचा सकेंगी एक दूसरी विशेषता, जो इन समीक्षको द्वारा हमारे साहित्यिक अनुग्नीलन में लाई जा सकेगी, साहित्य के समाजोपयोगी स्वरूप की प्रतिप्था होगी वर्तमान साहित्य एक वडी सीमा तक

१९ प्राकक्रथन

स्वनिष्ठ और ऐकाम्तिक होता जा रहा है कवि और लेखक जीवन कि समाज के प्रति उत्तरदायित्व खोते जा रहे है नया विवेचन उन्हें तहुत-हुई ने में सहायक होगा

मा ले तवयूग के सस्कृतिवादी समीक्षकों से इन वर्गवादी समीक्षकों का किंत विषयो में कितना मतभेद होगा, यह श्रष तक अर नही हो पाया दोनों श्रेणी के समीक्षक एक ही क्षेत्र में काम कर रहे हैं, उनकी सामाजिक और साहित्यिक दृष्टियो में अन्तर प्रवध्य है पर दोनों ही साहित्य की सार्वजनिक उपादेयता के हिमायती है, इसलिए यह असम्भव नही कि दोनो के अनृशीलन प्रादान-प्रदान की स्वाभाविक प्रक्रिया हारा एक-दूसरे के समीप पहुँचने लगें पिद्धास्तों श्रीर जीवन-दृष्टियो में भ्रन्तर होते हुए भी व्यावहारिक धरातल पर दोनो का समीप भा जाना झ्राइवर्य की वात होगी

जहाँ एक ओर यह नया सामाजिक दर्शन हिन्दी साहित्य की विचार-भमि में प्रवेश कर रहा है, वहाँ दूसरी श्रोर मनोविज्ञान--कोरा व्यत्ितमृसी श्रीर ऐकान्तिक मनोविज्ञान भी--मनोविश्लेषश के एक नए तत्त्वज्ञान का विद्यापन करने लगा है इस नए तत्त्व-ज्ञान की मूल प्रतिज्ञा यह हैं कि साहित्य और कलाश्ो का सम्बन्ध व्यक्त के अन्तरमन मे रहा करता है, भ्ौर साहित्य प्रत्येक अवस्था में इस अन्तर्भन की ही अभिव्यक्ित होता है सामाजिक प्रगतियाँ भर मानव-विकास हमारे इस मूल या श्रादिम मानस को बदल देने में भ्रक्षम हैं और यह भ्रादिम मानस ही साहित्य तथा कलाश्रो का प्रेरक है जो कुछ परिवर्तन साहित्य या कलाशो के क्षेत्र में होते है, वे सब श्रौपचारिक है, और केवल हमारी अन्तश्वेतन वृत्ति को ही नाना छद॒म वेशों में उपस्थित करते हू

हमारी मूल वृत्तियों का उदात्तीकरण भी होता है, परुतु भ्रत्यन्त सीमित रूप में और केवल दिखावे के लिए। उससे साहित्य वी मृत प्रेरणा झौर कंलागत प्रभाव पर कोई विशेष असर नह पड़ता | वत्कि यदि कोई ताहित्यिक कृति अत्यधिक उदात्त या बौद्धिक हो गई है तो वह अपना वास्तविक प्रभाव और अनुरजकता व्यक्त करने में एक वडी सीमा तक असमर्थ रहेगी

धार्मिक साहित्य, भवित और ग्रात्मोन्मुखी दर्भन भ्रादि मनोविश्लेषण की कंसोटी पर कसे जाते पर अनेक भ्रस्वाभाविक कृष्ठाश्रों के परिणाम सिद्ध होते हैं परन्तु यह सारा-का-सारा विश्लेषण व्यक्तिम्‌लक है जब कि धर्म श्र दर्शव की विवियाँ भ्रौर निर्देश पूर्णंत सावंजनिक है | बिना वा हा जगत की परिस्थि- तियो और आवश्यकताभ्रो का आकलन किये केवल किसी भक्त, कवि या दाश्े-

१२ महाकवि सूरदास

निक का मनोविश्लेषण करने वंठ जाना वडा ही चिन्तनीय प्रयोग जान पडता है प्राचीन काल में धर्म भर दर्शन के साथ युग की समस्त विकासोन्मुख सस्कृति जुडी हुई थी बिना उस सम्पूर्ण विकास का लेखा लगाए व्यक्तिगत मनोभूमि का विश्लेषण करने लगना भयानक एकागिता है। आादइचय तो यह है कि प्राचीन विकासोन्मख धर्म श्लोर ससक्ृति का विवेचन करने में वर्ग वादी अथवा भोतिक यथार्थवादी आलोचक भी उतने ही अनुदार है जितने ये श्रादिम मानस के प्रतिष्ठाता विश्लेषणवादी' कदाचित्‌ ये इस सत्य का ही उदघोष करते हू कि अतिवादी सीमा पर पहुँचकर दो प्रतिपक्षी मिल जाते है (079708/685 77०७४) यदि यह बात है तो सत्य इन दोनो से दूर है श्लोर वह तटस्थ ऐतिहासिक और भावात्मक अनुशीलन द्वारा ही उप- लव्ध हो सकता है। हम यह नही कहते कि मनोविर्लेषण-सम्वन्धी इस सिद्धान्त का साहित्य की सीमा में कोई उपयोग ही नहीं सम्भव है, साहित्यिक निर्माण तथा उसके श्रास्वादन की प्रक्रिया में मानव को उस आरादि-जात प्रवृत्ति का स्थान हो जिसे काम-वृत्ति कहते हे यह भी भ्रसम्भव नही कि इस तत्त्व-ज्ञान को सहायता से उन श्रनेक रचनाओं का सम्यक्‌ विश्लेषण किया जा सके जिनमें रचयिता की मनोवृत्ति श्रतिशय कूँंठित, अ्रन्तमुख और शअ्रस्वस्थ रही है। उन सामाजिक परिस्थितियों का अध्ययन भी उपादेय होगा जिनमें इस प्रकार की अ्रस्वस्थ कृष्ठाएँ इतनी इफरात के साथ पनपती और बढती है हम- इस सिद्धान्त की सहायता से साहित्य की उन शैलियो और रचना-प्रकारों को भी समभ सकेंगे जिनमें अ्स्वस्थताजन्य कल्पनाओ और प्रतीको का वाहुल्य हुआ करता है परन्तु सूर और तुलसी-जैसे महान्‌ और प्रतिनिधि कवियों का विश्लेषण इस एकागी आधार पर करना अनुचित और अशोभनीय होगा इसी प्रकार वर्गवादी समाज-दर्शन के घेरे में भी सूर-जैसे महान्‌ प्रतिभा- शाली कवि नही समा सकते महान्‌ प्रतिभा समय, समाज या सिद्धान्त-विशेष की चौहददी मे रहकर उनका अ्रतिक्रमण कर जाती है। ऐसी ही प्रतिभा वाले कवि राष्ट्रीय सम्पत्ति बन जाते है | मनोविश्लेषण भ्रौर माक्सेवादी समाज-दर्शन के कट्ट अनुयायी भी प्रतिभा की अ्रसीम और भअ्ननिर्देशय सभावनाञो को स्वीकार करते हूँ स्वय फ्रायड ने 'लिश्रोनार्डो विच्सी' के व्यवितत्व और उसकी कला का विश्लेषण करते हुए यह स्वीकार किया है कि लिओेनार्डो के वयक्तिक मनोविश्लेपण से उसकी कला के महान्‌ सौन्दर्य और प्रभावशालिता का कोई

प्राककथ - १३

प्रन्दाजा नही लगता माक्सवादियों ने भी भ्रपवाद रूप में प्रासाधरण प्रतिभा की लोकोत्तरता स्वीकार की है प्रस्तुत पुस्तक में इसीलिए हमने सूर को इन नवीन मतवादो के प्रयोग- क्षेत्र से दूर ही रखा है। प्रथम भ्रध्याय में भारतीय धर्म की एक विशेष साधना के रूप मे भक्ति का विकास प्रदर्शित किया गया है। सामान्य अनुराग, समादर और श्रद्धा से आगे बढकर क्रमश जीवन में जो अपार निष्ठा सनिविष्ट होती है, वही भक्ति का नाम ग्रहण करके एक मह॒ती जीवन-साधना बन जाती है यह साधना स्वभावत अत्यत गहन और ऐकान्तिक होती है, परन्तु इसका लोक - पक्ष भी उतना ही व्यापक और उदात्त होता है वर्तमान यूग की ऐकान्तिक प्रवत्तियो को भक्ति नही कहा जा सकता, क्योकि वे तो किसी जीवन-व्यापी साधना से सबद्ध होती है और उनका लोक-पक्ष ही वसा प्रशस्त होता है किस प्रकार भक्ति के द्वारा जीवन के आत्मिक और नैसिक पक्षो में परिपृर्णता भाई थी और भक्तित-मार्ग ऐकान्तिक होता हुआ भी कंसे लोकादर्श वन गया था यह “भक्ति के विकास में प्रदर्शित किया गया है यह भक्ति-मार्ग इतना प्रशस्त और बहुमुख्ी था कि इसकी सीमा में अनेक बौद्धिक और दार्शनिक निरूपणों ने स्थान बना लिया था। श्रागे चलकर ये दाशनिक निरूपण सम्प्रदायवद्ध हो गए और इनमे बहुत-कुछ संकीर्णता श्रौर कट्टरता भी गई ये पूजा-उपचार की बाहरी विधियों को प्रमुखता देने लगे | परन्तु मूलत ये सभी भक्ति की महान्‌ साधना के अ्रज्भभूव थे। ये केवल यह सिद्ध करते थे कि भक्ति की विस्तृत सीमा मे अनेक'जीवन- दृष्टियो के लिए स्थान है। ईश्वर, जीव या जगतृ-सबन्धी विचारों मे कितनी ही भिस्नता क्यों हो, कोई भी व्यक्ति भक्ति-मार्ग का अनुयायी हो सकता है। दूसरे अध्याय मे भक्ति की विशाल प्रवाहिनी में दर्शन के कितने महापोत्त चला करते थे, इसंका इगित या उल्लेख किया गया है तीसरे अ्रध्याय में सूर की जीवनी के वे विवरण दिये गए है जिन पर विवाद दूर होता जा रहा है और लोग एकमत होते जा रहे है। इस जीवनी के आधार पर किसी प्रकार के साहित्यिक निष्कृषं निकालना, जब तक वे दूसरे प्रमाणो द्वारा भी पुष्ट होते हो, समीचीच नही है उदाहरण के लिए (0५ &7078000 59७१0 ७॥7 ए07037७8ए७ 800 ७छ७'68 शरण (०ेए 00778%8व4 शात्री 8ग786007, फ6 ॥8ए8 $0 2#वैगारे ॥86 8॥80 ६॥6

79078 0६ 8एच80 ##श््यगशाए 78 ए870४७०४ए७०७॥।ए ॥90068870]6 50 ,8०7७०१० 789 एपरथ्--8877ए720 एफ७ए०, ? 97-98,

१४ महाकवि सूरदास

यह समभना कि सूर का काव्य विनय श्र लीला के दो अ्रशो में विभाजित है, जिनमें से एक का निर्माण कवि के वैष्णव मत में दीक्षित होने के पहले ओर दूसरे का उसके पश्चात्‌ हुप्रा--शऔर इस सदिग्ध निर्णय के आधार पर इन दोनो अ्रणो में दो भिन्‍न मतो या दर्शनो की छाया देखना बडे ही ख़तरे का काम है जीवनी जीवनी ही है, उससे अधिक कुछ नही

चौथे श्रध्याय में सूर के काव्य की मनोवैज्ञानिक और भावात्मक पीठिका तेयार की गई है। एक विशिष्ट आध्यात्मिक दर्शन के समकक्ष उनकी काव्य- धारा प्रवाहित हुई है, यह पाँचवे अ्रध्याय में प्रदर्शित किया गया है। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि सूर का काव्य लौकिक श्रृज्भार की भूमि पर स्थित नही है. वह उनके शअध्यात्म-दर्शन का प्रस्फुटन है छठे अ्रध्याय में यह दिखाने की चेप्टा की गई है कि सूर का काव्य युग की सास्क्ृतिक आाकाक्षाप्रो की पति करता है श्रोर एक नए सास्कृतिक धरातल का निर्माण भी करता है, जिसकी सीमा में उनकी रचनाएँ उच्चतम जीवन-मर्म की श्रभिव्यक्ति कर सकी हैं। यही उन अ्रसाहित्यक समीक्षको के समाधान में भी दो-चार बाते कही गई हैँ, जो सूर के काव्य पर श्रनेतिकता का आरोप करते हूँ

इन अध्यायो में हमारी विवेचना एक विचित्र द्वन्द्द या अंत सघर्ष से होकर निकली है। एक शोर समक्ष सूर का भवित-काव्य था, जिसकी मामिकता भ्रसदिग्य थी और दूसरी ओर उक्त काव्य मे वर्णित कतिपय ऐसे प्रश्नग थे जो स्पष्टत अतिशय श्रुद्धारिक है कुछ स्थान ऐसे भी थेः जो श्राधुनिक नेतिक मानो के अनुकूल नही पडते हम किस सीमा तक इन दोनो में सामंजस्य देखें ? यदि इन्हे पूर्णत श्राध्यात्मिक स्तर पर रखने की चेष्टा की जाय तो सारा काव्य केवल प्रतीक या श्रन्योक्ति बन जाता है, जिससे उसका काव्य- गौरव नष्टप्राय हो जाता है। और यदि हम उसे भ्रस्तुत या प्रकृृत काव्य की भूमिका पर लें तो उसमें सहज ही दोष दिखाई देता है। हमने स्पष्ट रूप से समस्त काव्य को प्रकृत भूमि पर ही भ्रहण करके उनकी मनोव॑ज्ञानिक प्रौढता का निर्देश किया है। यही हमारे लिए साहित्यिक दृष्टि से एक-मात्र मार्ग था |

परन्तु जिन जिज्ञासुओं का केवल मनोवैज्ञानिक भूमिका पर समाघान नही होता, उनके लिए थधास्त्रीय आ्राधघार पर कतिपय प्रतीको का उल्लेख हमने पुस्तक के सातव अ्रध्याय मे किया है हम स्वत इन प्रतीकार्थों के पक्ष में नहीं परन्तु साम्प्रदायिक और बास्त्रीय ग्रथो में दी गई प्रतीकात्मक व्याल्याग्रों का प्रसगत उल्लेख कर देने में हमने कोई हानि नही समझी ग्रद्यवि ऐसा करने पर कई नई समस्याएँ भी खडी हो जाती है समस्त भक्‍त कवियों की कविता तो

माककथन १५

काव्य की दृष्टि से और उसमें निहित मनोवेज्ञानिक प्रौढता की दृष्टि से एक ही श्रेणी की है। उनमे परस्पर बहुत बडा श्रन्तर है। परन्तु रचनाओ्रो की प्रतीक-व्याख्या दे देने पर सब एक ही स्वर पर पहुँच जाती है, जो साहित्यिक विवेचन की दृष्टि से कदापि अ्रभीष्ट नही परन्तु हमारा उद्देश्य भक्त कवियों

" के काव्यगत सौन्दर्य को तिरोहित करना था हमने केवल श्रातुषगरिक रूप में

प्रतीकार्थों का जिक्र किया है

वस्तुत सूर के काव्य का वास्तविक सौन्दर्य हमने श्राठवें श्नौर श्रन्तिम श्रध्याय में अकित करने की चेप्टा की है। यहाँ हमने समस्त साप्रदायिक, दाशनिक भ्रथवा सास्कृतिक भ्रावरणो या परिवेशों को श्रलग रखकर महाकवि सूर के काव्योत्कर्ष को परखने का प्रयत्त किया है। हमारे समक्ष सर की भावात्मक परीक्षा के कोई पूववे-निर्दिप्ट प्रतिमान नहीं रहे हैँ। ग्रतएव इस क्षेत्र में हमें भ्रपती ही सीमित योग्यता भौर अनुभूति से काम लेना पडा है। सूर के काव्य का महान्‌ सौन्दर्य उद्घाटित करना हमारे सामर्थ्यं के वाहर की बात रही है, एक छोटे निबन्ध की सीमा में उस सौन्दर्य को समाहित कर दिखाना तो असस्भवप्राय कार्य था। फिर भी सूर-काव्य के प्रति जो भ्रन्तनिहित श्रद्धा मेरे मन में रहो है, उसने अपनी भ्रभिव्यक्ति की पगडडी ढूँढ ही ली है

मेरी इच्छा थी कि सूर की समसामयिक सामाजिक परिस्थिति का कुछ विस्तार के साथ उल्लेख करता, परन्तु समय और स्थान के सकोच के कारण वह इच्छा स्थगित रखनी पडी। सूर की काव्य-भाषा पर भी एक स्वतन्न निबध की झावश्यकता रह गई है। पृस्तक के प्रथम तीन श्रध्यायो का प्राय सारा कार्य मेरे निर्देशानसार भेरे प्रिय. छात्र श्री मधुसूदन वाखले एम० ए० ने किया है। अ्तएव उसकी इच्छा के विरुद्ध भी उसका नामोल्लेख

यहाँ आवश्यक हो गया है। मेरी आन्तरिक शुभकामनाओ के साथ वह मेरे मुखर भाशीर्वाद का भी अधिकारी है। |

सागर-विश्वविद्यालय

शरद पूर्णिमा, २००९ वि० . “नन्‍्ददुलारे वाजपेयी

विषय-क्रम '

प्रावकथन * (-१६ भ्रध्याप. विषय पृष्ठ १, भक्ति का विकास हि ॥ं हि ०, भवक्ति-सम्बन्धी दार्शनिक सम्प्रदाय ' * *. शे४ /$. सर की जीवनी और व्यत्रितत्व कट. 0 की. सह. हे

४. आत्मपरक भावभूमि हि है हे * पर ४५ दाअनिक पीठिका * हे है * ९४ ६. सास्कृतिक और नैतिक पक्ष. * * हि * १११ ७. प्रतीक-योजना * १२३

८, काव्य-सौन्दर्य * * ; हे * १२४१

भक्ति का विकास

बेदिक युग

वेदिक काल में प्रकृति के विभिन्‍न तत्वों की प्रतीक रूप में पुजा की जाती थी। ये प्रतीक इन्द्र, वरुण, रुद्र, मत श्रादि देव रूपो में, सब शक्तिमान्‌ सृष्टि के ग्रादि कारण, परब्रह्म परमात्मा फे ही स्वरूप समभे जाते थे इस समय तक ब्रह्म के स्वरूप का निर्णय हो चुका था गम्भीर चिन्तन द्वारा उसका निरूपण भी हुआ था जितने गम्भीर विचार द्वारा ब्रह्म-निरूपण वैदिक ऋषियों ने किया उतना आगे चलकर कही उपलब्ध नहीं होता लोकमान्य तिलक ने कहा है कि “ऋग्वेद के नासदीय सूवत में जिनकी स्वाधीन उत्तम चिता है, उतनी आज तक भनुष्य जाति नही कर सकी ।” इसी ब्रह्म की उपा- सता प्रतीक देवो के रूप में करना ऋषि श्रपना कत्तंव्य समभते थे

वेदिक मन्त्रों में विवशता का श्राभास कहीं नहीं मिलता बेदिक ऋषि पूर्ण उल्लास से अपन्ने रक्षक, मिन्न तथा सुहृद देवताश्रो के प्रति प्रेम भरे सन्‍्त्रो को उच्चारण करते थे “ऋग्वेद में मनुष्य और देवताश्रो का जैसा सम्बन्ध हैं वैसा भागे के हिन्दु-साहित्य मे नही है यहाँ देवता मनृष्य-जीवन से दूर नही है आरार्यो का विश्वास है कि. देवता उनकी सहायता करते है, उनके शत्रुओं का नाश करते ह। वे मनुष्य से प्रेम करते है और प्रेम चाहते है भारतीय भक्ति भस्भ्रदाय का आदि-स्रोत ऋग्वेद है। यहाँ कुछ मन्त्रो में आदमी और देवता के | बीच में गाढे प्रेस और मित्रता की कल्पना की गई है ।!१

१. हिन्दुस्तान की पुरानी सभ्यता”, डॉक्टर वेणी प्रसाद, पृष्ठ ४२ |

“रे

महाकवि सूरदास

देव-पुजा में इन्द्र, वरुण, सूर्य श्रादि के प्रति कही गई ऋचाओं से विष्णु के प्रति कही गई ऋचाग्रों की संख्या कम है केवल ऋचाझो फी संख्या फे ही श्राधार पर कई विह्ान्‌ इन्द्रादि की, विष्णु से अधिक महत्ता स्थापित करते हैं ।* कुछ विद्वान ऐसे भी हें जो केवल संख्या को ही आधार मानकर श्रन्य अनेक वातो का विचार करते हुए विष्णु की श्रेष्ठतता और महत्त्व का निर्देश करते हैं ।* मन्त्रों की संख्या श्रादि से विष्ण का गोरारव कोई भले ही सिद्ध करे, पर वेदिक काल के सर्वप्रिय देव इन्द्र जिस तत्परता से भनुष्पो की लहायता फरते हैं, उसी तत्परता से विष्णु भी दिष्ण लोक-रक्षा के लिए नित्य तत्पर बताये गए हैं। इस विषय में वे इच्ध से कम नहीं हैं श्रीयुत्त डांडेकर ने अभ्रपने लेख में लोक-रक्षा से सम्बन्धित इन्द्र और विष्णु के तीन सम्बन्ध स्थापित किये हैं ।* पहला वह सम्बन्ध है, जिसमें इन्द्र शोर विष्ण एक-दूसरे फे सहायक हैं कहीं दूसरे स्थल पर विष्ण को इन्द्र से श्रेष्ठ स्थान प्राप्त हुआ है एक श्रन्य स्थल पर वे वामन रूप में इन्तर की सहायता उपस्थित होते हैं। लेखक ने संभावना प्रकट की है कि कदाचित्‌ इसी कारण आगे चलकर पुराणों में विष्णु का दूसरा नाम उपेन्द्र रखा गया। संख्या के श्राधार पर विष्ण का गौणत्व भले ही बताते हो परन्तु उसी लेख में उपयु क्त तीन सम्बन्धों द्वारा श्रपरोक्ष रूप से विष्णु

की महत्ता भी मानते है हम कह चके हैं कि वंदिक प्रार्थताओ में प्रेम भरा-पूरा था। कुछ ऋचाझो में विष्ण के प्रति एसी सान्निध्य लालसा की प्रेमपर्ण भावना प्रकट की गये है जो वेष्णव-भक्ति के बीज रूप में यत्र-तत्र छिटकी हुई है। यथा (१) विष्णु लोक के प्रति कामना तदस्य प्रियमभि पाथो प्रश्याम (से विष्णु के प्रियधाम को प्राप्त करू ।) (६) विष्णु की कृपा के लिए प्रार्थना महस्ते विष्णो: सुर्मात भजामहे (हे विप्णु आप महान हैं; श्रापकी सुमतति

१. ४0०प्रा7९ 50065 7 770000289 97९5०7९0 40 37. 0० (एश्ाप (86 ४९१०७ 09 *९. ९. 720706[ववा,

?. ५०)

२, (0॥62(९त १४०75 04 रि 6 जाध्यतंधशारव7, 0. 47-

३. “जञाज्ञागाए0 पर 6 ९९१४५! 0९८प्रा5 ॥7 6 ए0]प7776 0 50065 7 770008ए [॥९5९॥९0 ३६0 7. ॥६9॥6 वैष्णव धर्म का विकास और विस्तार, (#प्णदत्त भारद्वाज एम. ए., आचाण, गास्त्री , 'कल्याण वर्ष १६, अक ४)

५, वही

भक्ति का विकास |

का हम भजन करते हैं भ्र्थात्‌ कृपा के लिए प्रार्थना करते है।) इतना ही नहीं भ्रागे चलकर भक्ति-प्रन्थो में जो श्रवण, कीतंन विष्णो

स्मरण आदि नवधा भक्ति का विधान है, उतका भी आशिक उल्लेख वेदिक भ्रन्‍थों में मिल जाता है ।*

वेदों में ब्रह्म की निराकार रूप में पुरुष सुक्त द्वारा स्तुति की गईं है। बेष्णव भक्ति (भक्ति-सार्ग ) में उपास्य के प्रति जिस स्वजन-भावना तथा जिस परिचय- सामीष्य की आवश्यकता होती है, उसी की पूर्ति के लिए जिस अ्रवतारवाद के सिद्धान्त का झागे अ्रविर्भाव हुआ, उसका श्राधार पुरुष सुकत में निहित है

भ्रवतारवाद के विषय में यद्यपि स्पष्ट झूप से वेदों में कुछ भी उल्लेख नहीं - है, परन्तु कुछ ऐसी बातें है, जिनके आधार पर हम कह सकते हैं कि उसका

प्रारम्भिक रूप वेदिक ऋषियों को भ्रवगत था ।*

१. अवणं--सेदु श्रवोभियज्य चिदभ्यसत्‌ (ऋक्‌० १।१५६।२) अ्र्थ--वह चेतन जीव ध्यानगम्य परमात्मा को उसके यश श्रवरा द्वारा (प्राप्त करने का) अ्रभ्यास करे कीतंनं--विष्णोनु' वीर्याणि प्रवोचम (ऋक्‌० १।१५४१) श्र्थ--मैं भ्रव विष्णु भगवान्‌ की लीलाझ्रो का प्रवर्चंन करता हूँ तत्तदिदस्य पोस्थ गृणीम सीनस्य त्रातुर वुकस्य मीढुष.

(ऋक्‌० १११५५।४४) अ्र्थं-त्रिभुवन पति, जगद्रक्षाविचक्षण, अरहिसक, कामना-वर्षी इन विष्णु के चरित्रों का हम सब कीतेन करते हे

- स्मरणं--प्रविष्ण॒वे शूषमेतु मन्म (ऋक० १।१५४।४) अ्रथ--जिन भगवान्‌ की माधुरी से श्रोत-प्रोत एव भ्रपनी दिव्य शक्ति से अक्षय तीन चरण--चरणो के तीन विन्यास (भक्तों, आश्रितो, सेवको को) आनन्द देने वाले हूं। * आादि। जो (वेद में नवधा भक्ति, क्ृष्णदत्त भारद्वाज एम० ए०, आचार्य, शास्त्री, कल्याण वर्ष २०, अरक ५।) २. “॥ ग्राप& 9526 इधते +90 (086 8 70 ०९०7 7९७०९॥८०७ "0 006 8ए87/ (760"ए 88 5प८०0॥ 76 ५८१४5 छप+ 6 8९778 0[ 80776 0क्‍76 (€४/प्रा.४5 04 48( 0०07067- (07 दा ८४वशएयए ६0 960प्रात का ॥] ए८०८ 99558265.”' ( जय 708 ४6१४७ 99 २] क्वा06ेत/), #07

8. ए0ग्रा76 0३ 50रत65 7 ॥70008ए ए9768९९१ ६० 7. 8०706, ७9 05.

नी

प्‌ महाकवि सूरदास

विप्ण मे कुछ श्रन्य ऐसी विशेषताएँ भी हैं, जिनके कारण उनके विषय प्रेश्नागें चलकर अवतार की तत्त्वतः विचारणा करनी पडी। पहली विद्येपता यह है कि बेढो में विष्ण को ऐच्छिक रूप धारण करने वाला कहा यया है। इसरी चित्रेंदता यह है कवि विष्ण ने तीन पण जगह मानव-धर्म की रक्षा के लिए नापी वाराहु अवतार का भी श्राभात पीछे फे वेदिक मंत्रो मे मिलता है 'गेकडानल्ड' विष्ण में एक रक्षक का भी युण बताते है बेदी के अनुसार विष्णु हितकारी, सम्पत्त रक्षक हूँ ।* वेदों में ब्रह्म के विभिन्‍न पक्षों का निरूपण हुआ हो है, श्रतएवं भवित-मार्ग के लिए आवश्यक (सिद्धान्त पक्ष में) ब्रह्म के स्वरूप का मिरूपरा, ब्रह्मजीव का सम्बन्ध, जगत्‌-जीव का सम्बन्ध, ब्रह्म-जगत्‌-सम्बन्ध तथा (उपासना-पक्ष में) विष्णु का लोक-रक्षक तथा जब-नव-रंजनकारी व्यक्तित्व, उनकी लोलाएं, नवधा भक्ति श्रादि भक्ति के श्रावश्यक श्रग वेदों से मिल जाते है। ये सब वाते यत्र-तत्र बिखरी हुई हैं आगे चलकर नक्ति-मार्य मे भक्ति के लिए आवश्यक सब सिद्धान्तो, व्यवहारों एवं श्रन्‍्य पक्षो, अंगों श्रादि का शास्त्रीय स्थापन हुआ। वैदिक युग में यह शास्त्रीय निरूपण नहीं हो पाया था ओर कदाचित्‌ तब तक भव्ति-सार्ग की प्रतिप्ठा मुक्षित-मार्ग के रूप में हुई थी परन्तु उपयु कत बातो पर विचार करते हुए कहा जा सकता है कि पेदो में भक्तित की ज्ारंभिक तथा घलवर्ती रूपरेखा उपलब्ध होती है भारतीय घ॒र्म के समस्त वीज वेदों में है, तदनरूप भवित के मूल तत्त्व भी वहाँ उपस्थित है डॉ० वेणीपसाद ने कहा हे क्षि “हिन्दू-भवित-सम्प्रदाय का आदि-लोत ऋग्वेद उपनिषत्काल तक श्राते-आते तथा उसके फुछ उपरान्त उपयु कत भविति- सिद्धाग्त कुछ भौर श्लागे बढ़ा ।“उपनिषदो में ब्रह्म के विविध स्वरूपो का विस्तृत वेचन मिलता है इसलिए यह काल ज्ञाव-प्रधान कहलाता है नह्म-ताक्षा- त्कार के विभिन्‍न मार्गों का यहाँ ऋच्छी तरह विस्तार हुआ, भवित भी ज्ञान से भिग्त श्रपना ज्ञान-भद्ति-मिश्रित अलग स्वस्प दिखाने लगी। इस तरह उप- निपत्काल के ज्ञान-काड में दो मार्ग दिखाई पडते है एक तो हृदय पक्ष को दिलवुल छोडकर केवल बुद्धि या ज्ञान को लेकर चला भर दूसरा हृदय पक्ष समन्वित ज्ञान को लेकर ।”* लोकमान्य तिलक ने भी लिखा है कि “वेद

ए570 77 ॥6 ५९१४५ 57 7. ९. 42)066# 2 हिन्दुस्तान की पुरानी सभ्यता, डॉ० वेणीमसाद पृप्ठ ४२॥ भवित का वियाय', प० रामचदा्ध शक्ल ('सूरदास नामक पुस्तक )

१६0. ,»९ ७» मी |]

भक्ति का विकास ही

तथा उपनिषत्कालीन ज्ञान-मार्ग से योग भक्ति ये दो शाखाएँ झ्रागे चलकर निर्मित हुई ।/१ उपानषत्कालीन ऋषियों को कदाचित्‌ यह तत्त्व अ्रवगत हो गया था कि केवल ज्ञान और, कर्म सार्ग पर लोक को चलाना सहज अ्रथवा कल्याणकारी होगा ईदवर ने फ्रमष्य को जितनी शबितियाँ दी है, उनमें शरीर श्रोर बुद्धि के सिवा हृदय भी है। हृदय की अवहेलना करना सार्ग को रूखा बनाना होगा। “मनुष्य-जीवन का उद्देश्य केवल ज्ञान-प्राप्ति नहीं जो स्वत शुष्क आनन्दहीन (हृदय-उद्भूत आनन्द) है। * उत्कट प्रेम ज्ञान के द्वारा दिव्य आनन्द की प्राप्ति यही 'बृहृदारण्यक' में बताये 'मध्‌ विज्ञान! का सार है। 'तैत्तिरीय उपनिषद्‌' विज्ञानमयी आत्मा से श्रानन्दमयी शआ्रात्मा को अधिक महत्त्व देता है।* इन द्वितीय श्रेणी के उपभिषदो या ज्ञान-चर्चाश्रो में भक्ति के विभिन्‍न श्रंगो का यथेष्ट विवेचन एवं प्रतिपादन , किया गया है।

इसी ह्वितीय प्रवत्ति के श्रतुसार कही तो ब्रह्म का स्वरूप “मनोमय प्राण-शरीर, प्रकाश-स्वरूप, सत्यसकत्प, आकाशात्मा, सर्वकर्मा, सर्वग्ध, स्वेरस-सम्पूर्ण

जगत को सब शोर से व्याप्त करने वाला, वाकू-रहित एवं सम्भ्रम-शन्य है ।' 3

और कही उसी ब्रह्म को प्राकृत शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गध से रहित बतला

कर यह सुचित किया गया है कि ब्रह्म हमारे इच्द्रियो के समस्त अ्रनुभवों की पहुँच से दूर है ।* 'तैत्तिरीयोपनिषद्‌! के भुगुवलली के समस्त अनुवाको में प्रन्‍्न, प्रणण, सन,

ज्ञान और आनन्द-स्वरूप ज़ह्म का भ्रच्छी तरह विषेचन हुआ है'व्वेताउवतरो- पतिषद्‌ में उसे उभय स्वरूप धारण करने वाला कहा गया है+५ तथा भअ्न्यन्न

दी |

'गीता-रहस्य' पष्ठ ५३७

“796 38900 ]0000776 7 4॥6 ०॥970॥99 5प्र79'' 9ए 3. िक्षाप8, , 8. ) ॥.7॥7 (270 ()76९709)] (.0॥- शिंशा08, (807।08) 9 473

हे. मनोमय प्राणशरीरों भारूप' सत्य सकलप झ्राकाशात्सा

सर्वे कर्मा सर्वगध स्वरस स्वेर्िदमभ्यात्तोष्प्रवाक्यनादर *

(छादोग्योपनिषंद्‌ ३११४।२)

* केठोपनिषद्‌ के प्रथम भ्रध्याय में ततीय वल्ली के १५वें इलोक में यही भाव प्रकट किया गया है।

ज्ञाज्ञो दावजा वीशनीशावजा हां को भोकत भोग्यारथयुक्ता (१, ६) |

-

6 महाकवि सूरदास

परन्रह्म सर्वेश्वर को स्त्री, पुरुष, कुमार, कुमारी, बूढ़े होकर लाठी के सहारे- सहारे चलने वाला बताया है ।"

, इस तरह भविति-मार्ग के लिए आवश्यक ब्रह्म का जो हृदय-प्राही स्वरूप चाहिए, उसकी विवेचना तया स्थापना हो चली थी “भारतीय भव्ति-मार्ग ब्रह्म का उभयात्मक स्वरूप ग्रहण करके चला'''व्यक्त और सग्गरण की नित्यता प्रवाह रूप है, अश्रव्यक्त और निग्ु णु की स्थिर ।*''जहाँ तक ब्रह्म हमारे मन और इन्द्रियो के अ्रनुभव मे सकता है वहाँ तक हम उसे सग्गुण और व्यक्त कहते है ।"“'हृदय को सग्रुण और व्यक्त रूप में अनुरवत रखते हुए सम्यक्‌- दर्शन के लिए उसकी निग्रु शा और अव्यक्त सत्ता को भी लेना पडेगा।' * उप- युंक्‍्तत उदाहरणो से यह ज्ञात होता है कि ब्रह्म के दोनों (निगुंण शौर सगुण) स्वरूपों का स्पष्ट विवेचन उपनिषत्कारों ने किया था। -

देवताओो की उपासना वेदिक मन्त्रों में पृथक्‌्-पृथक्‌ दी गई है। परन्तु ऋमशः सब देवता एक ब्रह्म से अभिन्‍न मान लिए गए है। वे ब्रह्म ही हैं, ऐसा कई उपनियदों ने कहा? --इतना ही नही, वह रुद्र, इन्द्रादि देवताझो का उत्पन्न करने वाला भी है।* इस तरह देवताश्ो का महत्त्व श्र उनकी पूजा भी कम ही चली तथा शुद्ध चिन्तन के लिए निगंण ब्रह्मा तथा हृदय-प्रधान उपा- सको के लिए उभयात्मक (सगुण निगुण) स्वरूप प्रतिष्ठित हुआ। “पर- ब्रह्म का ज्ञान होने के लिए ब्रह्मगचितन करना आवश्यक है इस हेतु परब्रह्म का सभुण प्रतीक प्रथम श्राँखों के सामने रवना चाहिए, ऐसा छादोग्य श्रादि पुराने उपनिषदो ने कहा है। उपासना-मार्ग मे समग्रुण प्रतीक के स्थान पर क्रमश परमेश्वर का व्यक्त मानव-छूपधारी प्रतीक-ग्रहण ही भवक्ति-मार्गे का आरम्भ है। “*“'ब्रह्म-चितनाथे प्रथम यन्न के अंगो की या ओकार को तथा

१. त्व स्त्री तव पुमानसि त्व कुमार उत वा कुमारी त्व जीसों दडेन वब्न्चसि त्व जातो भवसि विश्वतो मुख ॥३॥ २. भक्ति का विकास', रामचन्द्र शुक्ल, (सूरदास पृष्ठ ६१७ से) ३, “त्व ब्रह्मा त्व वे विष्णु त्वं रुद्र त्वं प्रजापतिः ।” (मैत्रायण्युपनिपद्‌ ४-2२-१३) “तदेवास्निस्तदादित्यस्तद्वाथुस्तदु_ चन्द्रमा तदेव शुक्र तद्‌ ब्रह्मा तदापस्तत्मजापति' ॥* (इवेताश्वतरोपनिपद्‌ ४-२) +

४. 'इ्वेतावश्तरोपनिपरद'

'भक्ति का विकास

भागे चलकर रुद्र, विष्णु इत्यादि वैदिक देवताओं अथवा आकाशादि सग्रुण व्यक्त ब्रह्म प्रतीक की उपासना प्रारम्भ होकर भ्रन्त में इसी हेतु ब्रह्म-प्राप्त्यर्थ राम-कृष्ण, नुसिह आदि की भवित प्रारम्भ हुई ।/" इस तरह देवताशो का स्थान नियुण ब्रह्म ने तथा धीरे-धीरे निगुण का स्थान सगुण साकार ब्रह्म ने ग्रहण किया ब्रह्म के सगुण स्वरूपों में विषण को महत्ता बढ़ती जा रही थी। “ऋग्वेद में गौण स्थान प्राप्त विष्णु का स्थान श्रब त्रिदेवो मे हुआ उसकी बढती हुई महत्ता का ग्राभास ब्राह्मण-पग्रन्थो में मिलने लगा शतपथ ब्राह्मण में विष्णु को देवताश्रो से सर्वश्रेष्ठ कहा है। देवताओं का मुख विष्णु है। *

ब्राह्मणा-काल * में श्रग्नि को विष्णु से गौर स्थान प्राप्त है तथा विष्णु की श्रेष्ठता स्थापित की गई है ।* शतपथ ब्राह्मण में विष्णु की श्रेष्ठता सिद्धि के, लिए एक यज्ञ किये जाने का उल्लेख है ।” इसी - प्रन्थ में वह है जिसमें यज्ञ- स्थान-प्राप्ति के लिए श्रसुरों श्रोर देवों के युद्ध को वामन ने निपटाया था। वामन भूमि पर लेट गए, काया को बढ़ाते गए और श्रन्त में सारी भूमि को अपने शरीर से ढक लिया, फलतः भूमि देवताशो को मिल गई। भवित:साग्गे के आराध्यदेव विष्ण की इस काल की बढ़ती हुई महत्ता वंष्णव-भक्ति-मार्ग - के विकास की छोतक है अभी भक्ति की, शुद्ध मुक्ति-सार्ग के लिए स्थापता नहीं हुईं थी परन्तु उपयु बत सब प्रमाणों को दृष्टि में रखकर कह सकते हे कि ऋषियों शौर उपासकों का दृष्टिकोरा श्रव धीरे-धीरे शुद्ध बद्धिवादी ताकिक प्रकृति-पुजन-प्रधान उपासना से हटकर हृदय को भी स्थान देने लगा था, शोर इसी विकासोन्मुख मार्ग के श्रालम्बन अ्रथवा उपास्य हो रहे थे, विष्ण

विष्णु को संत्रेयगी उपनिषद्‌ (६, १३) में जगत्पालक, श्रन्त का स्वरूप कहा गश है तथा कठोपनिषद्‌ में श्रात्मा की ऊध्वंगामी गति को विष्ण के परस धाम की श्रोर जाने वाला पथिक कहा गया है ।* जगत्‌ का भरण-पोषण करने वाले श्रन्न को विष्णु का स्वरूप बताकर उपासकों के हृदय भें विष्णु के

"गीता रहस्य, लोकमान्य तिलक, (पृष्ठ ३८ )। हे “५शशागाप्र 7 06 ४७१०४” १ए ९, 704706628४७ ॥7ण7

2 ४0प्रा76 0 9प्रता९5 77 776008ए 97९5९760 ६० वय ४876, 9 705. |

अग्निर्वे देवाना श्रवम विष्णु परम. तदन्तरेर] सर्वा देवता: | (ऐ० ब्रा०) « ऐतरेय ब्राह्म॒रा १॥१। * शतपथ ब्राह्मण १४॥१॥१ * कठोपनिषद्‌ ३६

># ०६ >थ०

' महाकवि सूरदास

जगत्‌ का भररा-पोषण करने वाले श्रन्द्॒ को विष्णु का स्वरूप बतलाकर उपासकों के हृदय में विष्णु के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता तथा प्रेम फी भावना स्थापित की गई है जीवन का ध्येय भी उसी विष्णु की प्राप्ति बताकर, विष्णु की उपास्यदेव के स्वरूप में स्थापना हुईं जो लोक का पालन, भरण-पोषण करे वही तो हमारा प्रेम-पात्र तथा श्रद्धेय हो सकता है विष्णु में थे गण वेदिक- काल से ही बताए गए है जगत्पालक सुर्य विष्णु का ही रूप था जो श्रव अन्त हो गया “इसके उपरान्त उपास्य के अधिक सान्निध्य की उत्कठा से, उसे अ्रधिक हृदयाकर्पक रूप में पास लाने की लालसा से विष्ण की नराकार भावना नारायण (विष्णु) के रूप में प्रकट हुई ।*

इस तरह उपनिषद्‌ में विष्ण को क्रमशः मनुष्य के अधिक साल्िध्य में रखा गया और वेष्णव भक्तों के परम देवत्व की स्थापना हुई

विष्णु के इस स्वरूप का साक्षातकार कंसे हो, इस हेतु उपासक के लिए विधान रूप मे कुछ कर्मो की भी शआ्रावश्यकता बताई गई ब्राह्मण-प्रन्थों मे एक स्थान पर आया है कि ऐश्वर्य श्रौर सर्वेस्व की प्राप्ति के तिए “पुरुष नारायण' ने पंच्रात्र-यज्ञ की विधि चलाई ।* “इसमे पुरुप सूवत द्वारा नरमेध यज्ञ होता था और बलि के स्थान पर घृताहुति दी जाती थी ।”३

अनुमान होता है कि वेष्णव-यज्ञों में हिसा करना चर्ज्य समझा जाने लगा था ।* श्रहिता-तत्व का वेष्णव-धर्म में प्रदेश कदाचित्‌ यहीं से प्रारम्भ होता है यज्ञों में सत्वगुण का श्राधिन्‍्य रहता था “यज्ञ करने वाले सत्वग्रण भूयिष्ठ होने के कारण 'सात्वत' नाम से प्रसिद्ध हो गए ।** इसलिए वैष्णव धर्म का नाम 'सात्वत